Tuesday, February 16, 2016

मीनापुर की बेटियों ने भ्रूण हत्या के खिलाफ खोला मोर्चा

वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच फसा राष्ट्रवाद

मीनापुर से कौशलेन्द्र झा
राजनीति बामपंथ की हो या दक्षिणपंथ की। पर, राजनीति तो राष्ट्र के लिए ही होनी चाहिए। कही, ऐसा तो नही कि बाम और दक्षिण वाले अपने अपने लिए दो अलग राष्ट्र चाहतें हो? हो सकता है कि इसके बाद कट्टरता और समरशता के नाम पर भी बंटबारे की मांग उठने लगे। कही, धर्म या जाति को आधार बना कर राष्ट्र के बंटबारे की योजना तो नही है? हालात यही रहा तो आने वाले दिनो में कोई अपने लाभ के लिए महिला और पुरुष के नाम पर भी दो राष्ट्र बनाने की मांग कर दे तो, मुझे आश्चर्य नही होगा।
सोचिए, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राष्ट्र के टुकड़े टुकड़े करने की खुलेआम नारेबाजी और एक आतंकवादी का शहादत समारोह भारत के अतिरिक्त किसी और देश में होता तो क्या होता? क्या पाकिस्तान में कोई भारत जिंदावाद का नारा लगा सकता है? आपको याद ही होगा कि 1962 में चीन भारत युद्ध के बाद भी यहां चीन जिंदावाद के नारे लगाने वाले करीब 4 हजार लोगो को जेल भेजा गया था। क्या कभी आपने सुना है कि चीन में भारत जिंदावाद का नारा लगा हो? क्यों हम अपने हाथों से अपना घर तबाह करना चाहतें है? क्या यही राजनीति है? सोचिए, शरहद पर तैनात सैनिक जब अपने ही कथित रहनुमाओं की बातें सुनते होंगे तो उन पर क्या असर होता होगा? आखिरकार हम कब तक दक्षिणपंथ और बामपंथ के बीच, उनके नफ नुकसान के लिए पिसते रहेंगे?
मुझे नही पता है कि इस राजनीति का लाभ दक्षिणपंथ को होगा या बामपंथ को? पर, राष्ट्र को इसका नुकसान होना तय हो गया है। राजनीति का आलम ये हैं कि यहां लाश की जाति पता करने के बाद तय होता है कि आंसू बहाने में लाभ होने वाला है या चुप रहने में? सियाचिन के शहीदो को श्रद्धांजलि देने में अधिक लाभ है या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित राष्ट्र बिरोधी को शहीद बताने में अधिक लाभ होगा? दरअसल, कतिपय कारणो से हमारी बंटी हुई जन भावना हमें तमाशबीन रहने को विवश करती है। नतीजा, राजीतिक लाभ हेतु थोड़े से लोग हमे 16 टुकड़ों में बांट देने का धमकी देकर उल्टे गुनाहगार भी हमी को बता देतें हैं। आखिर कब तक हमारे अपने ही अपनो को बेआबरु करते रहेंगे? क्या यही है हमारी सात दशक पुरानी आजादी...?

Friday, February 12, 2016

मीनापुर में फिर मिले फर्जी शिक्षक

बिहार में अत्याधुनिक हथियार का धड़ल्ले से इस्तेमाल खतरे का संकेत

बिहार में सार्वजनिक जीवन जीने वाले की हत्या, अपराधियो के बढ़ते प्रभाव का खतरनाक संकेत है। इसे राजनीति से जोड़ कर देखने वाले, वास्तव में मामले की गंभीरता को समझ नही पा रहे है। पुलिस का नेटवर्क अबतक छोटी मछलियों तक ही फैला हुआ है।दरअसल, हमलावरों के हाथों में अत्याधुनिक फायर आर्म्स एके-47 का होना खतरे का बड़ा संकेत है। हालांकि, बिहार में यदा- कदा पहले भी एके-47 का इस्तेमाल हो चुका है। सवाल उठना लाजमी है कि क्या वैशाली जिले के किसी अपराधी गैंग के पास एके-47 है ? जवाब अगर हां में है तो पुलिस की जांच का डायरेक्शन सही दिशा में है और अगर ना में है तो उसे मोकामा टाल के उन संगठित अपराधी गिरोहों तक पहुंच बनानी होगी। जिनके पास ऐसे घातक हथियार होने के चर्चे आम हैं और जिनका नेटवर्क राघोपुर के साथ-साथ वैशाली जिले में भी फैला हुआ है। कहतें हैं कि राघोपुर का दियारा जहां समाप्त होता है, वही से बख्तियारपुर का दियारा क्षेत्र शुरू होता है। जो, मोकामा के टाल से सटा है।
अभी तक इस हाईप्रोफाइल मर्डर में जिन अपराधियों या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के नाम आए हैं। उनमें कई आपराधिक प्रवृत्ति के साथ-साथ अपनी दबंगई के लिए जाने जातें हैं। मेरी चिन्ता का कारण ये है कि सेना या पुलिस द्वारा इस्तेमाल होनेवाला घातक फायर आर्म्स एके-47  अपराधी तक कैसे पहुंच जाता है? इसकी पड़ताल बेहद जरुरी है। मेरा स्पष्ट मत है कि राजनीतिक नफा नुकसान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलबाड़ होना खतरनाक संकेत है और आने वाला वक्त इस लापरवाही के लिए हमें कभी माफ नही करेगा।