Saturday, August 16, 2014

... और अंग्रेज थानेदार को जिंदा जला दिया


मीनापुर थाने से यूनियन जैक उतारकर आजादी के दीवानों ने लहराया था तिरंगा

मीनापुर कांड से हिल गई अंग्रेजी हुकूमत की चूल, कई ने दी थी कुर्बानी


मीनापुर कौशलेन्द्र झा
बात 72 साल पुरानी है। 16 अगस्त 1942 को पं. सहदेव झा के नेतृत्व में स्वतंत्रता सैनानियों ने न सिर्फ बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत मीनापुर थाने से यूनियन जैक उतारकर तिरंग लहराया, बल्कि तात्कालीन थानेदार लुइस वालर को थाना परिसर में ही जिंदा जला दिया। घटना से ब्रिटिश हुकूमत की चूल हिल गई। हालांकि, इस संघर्ष में नौ लोग शहीद हो गए और कई दर्जन लोग जख्मी हुए।

8 अगस्त 1942 को राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी। इसी आलोक में 11 अगस्त को हरका के पं. सहदेव झा के दरवाजे पर देशभक्तों ने गुप्त बैठक की। मीनापुर फतह की योजना बनी। इसकी भनक अंग्रेजों को लग गयी। ब्रिटिश हुकूमत ने आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए नेपाल की सीमा पर स्थित अपनी फौज की एक टुकड़ी को मीनापुर रवाना कर दिया।

अंग्रेजी फौज पर टूट पर आजादी के दीवाने:

15 अगस्त 1942 को ब्रिटिश फौज के रामपुरहरि पहुंचते ही आजादी के दीवानों ने फौज पर हमला बोल दिया। इस संघर्ष में विसनदेव पटवा, चतर्भुज मिश्र, रमण राय, केशव शाही और बिन्देश्वर पाठक मौके पर ही शहीद हो गए और दो दर्जन से अधिक लोग जख्मी हुए। इस घटना से लोगों में आक्रोश और भड़क गया । आगे की रणनीति के लिए हरका में एक और गुप्त बैठक हुई।

मीनापुर थाने पर हमला :

योजना के मुताबिक 16 अगस्त 1942 की तपती दुपहरिया में स्वतंत्रता सैनानियों ने मीनापुर थाना पर धावा बोल दिया। थानेदार लुइस वालर को थाने पर जिंदा जलाने के बाद लोगो ने यूनियन जैक उतारकर थाना पर तिरंगा फहरा दिया। इस दौरान अंग्रेजों की गोली से चैनपुर के बांगूर सहनी शहीद हो गए। इसके अतिरिक्त झिटकहियां के जगन्नाथ सिंह, भिखारी सिंह, रीझन सिंह, पुरैनिया के राजदेव सिंह, रामदहाउर सिंह, चैनपुर के बिगन सहनी, हसनपुर के दुलार सिंह व चाकोछपरा के रौशन साह को गोली लगी थी। कई लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे।

पुलिस प्रताड़ना से दो की मौत :

पुलिस ने मीनापुर थाना कांड संख्या यूएस 396/42 में वालर की हत्या के आरोप में 14 व थाना में तोड़फोड़ करने के आरोप में 27 लोगों पर एफआईआर दर्ज किया। बाद में आरोपितों की संख्या बढ़ाकर 87 कर दी गई। अंग्रेजी हुकूमत ने छापामरी के नाम पर दर्जनों गांव में कहर बरपाया। महदेईया को आग के हवाले कर दिया गया। लोग अंग्रेजों के भय से घर छोड़कर भागने लगे। इसी बीच नेपाल के जलेसर जेल में पुलिस की प्रताड़ना से मुस्तफागंज के बिहारी ठाकुर व हरका के सुवंश झा की मौत हो गयी।

वालर को मैने मारा

वालर हत्याकांड की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। चैनपुर के जुब्बा सहनी ने जूरी की मंशा को पहले ही भांप लिया। फैसला आने से पहले ही भरी अदालत में जुब्बा सहनी ने स्वीकार कर लिया कि वालर को मैंने मारा। अंग्रेजी हुकूमत ने 11 मार्च 1944 को भागलपुर सेंट्रल जेल में जुब्बा सहनी को फांसी दे दी और पुरैनिया के राजदेव सिंह, रामधारी सिंह, मुस्तफागंज के बिहारी साह हरका के सुवंश झा व मुसलमानीचक के रुपन भगत को आजीवन कारावास की सजा दी गयी। वही हत्या आरोपित अन्य 8 लोगों को रिहा कर दिया गया। रिहा होने वालों में रौशन साह, लक्ष्मी सिंह, जनक भगत, पलट भगत, नारायण महतो, संतलाल महतो, अकलू बैठा व गोबिंद महतो का नाम शामिल है।

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