Monday, May 26, 2014

Kaushlendra Jha Minapur


Sunday, May 18, 2014

बिहार : इस्तीफा से उभरे राजनीतिक परिदृश्य

कौशलेन्द्र झा 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफा से उभरे राजनीतिक परिदृश्य को लेकर हमारा बिहार एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। मुख्यमंत्री इस्तीफा वापिस लेंगे या नही? संशय अभी भी बरकरार है। शरदजी की बतों से तो लगता है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन होके रहेगा। पर, विधायक दल के हठ के सामने हो सकता है कि नीतीशजी को झुकना पड़े। सवाल उठता है कि क्या यह जरुरी था? रविवार को पुरा दिन बिहार में राजद व जदयू के नए समीकरण की बात होती रही। हालांकि, स्वयं लालूजी इनकार करते रहे। किंतु, जदयू के राष्ट्रीय नेता केसी त्यागी ने राजद से हाथ मिलाने का जो संकेत दिया। क्या उसका दूरगामी असर नही परेगा? राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते मैं दावे से कह सकता हूं कि लोकसभा चुनाव परिणाम अपने जगह पर सत्य है। पर, यह भी उतना ही सत्य है कि बिहार आज भी नीतीश और लालू के ध्रूवीकरण से उबर नही पाया है। रविवार की घटनाक्रम ने नीतीश समर्थको को सोचने पर विवश कर दिया है। यदि, आज नीतीशजी अपना इस्तीफा वपिस लेतें हैं तो सम्भव है कि बिहार की राजनीति में ध्रूवीकरण बरकरार रह जाये। किंतु, यदि नेतृत्व परिर्वतन हुआ तो बिहार की राजनीति में भाजपा की धमक को रोकना और भी मुश्किल हो जायेगा। सबसे अहम बात तो ये है कि यदि इस उठा पटक के बीच बिहार में किसी की सरकार नही बनी तो राष्ट्रपति शासन अवश्यसंभावी है। यानी केन्द्र की सत्ता सम्भालने के साथ ही मोदीजी को बिहार का बागडोर थाली में परोस कर देने की तैयारी हो रही है। ताज्जुब की बात है कि बिहारी की थाली को मोदीजी के लिए सजाने वाले वे लोग हैं, जो खुद को मोदी बिरोधी होने का दंभ भरतें हैं। बहुत हो गया, रुठने और मनाने का दौड़। कुर्सी सम्भालिए, काम करिये और मुल्यांकन मतदाताओं को करने दीजिए।

बिहार की राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ पर

कौशलेन्द्र झा 

बिहार की राजनीति एक बार फिर से दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ पर है। मुख्यमंत्री के इस्तीफा को हल्के में नही लेना चाहिए। वल्की, इसके और भी कई संकेत हो सकतें हैं। दरअसल मंत्रीपरिषद की खींचतान व विस्तार का दबाव नीतीश कुमार पहले से झेल रहे थे। ऐसे में लोकसभा चुनाव परिणाम ने उनको अंदर तक हिला दिया है। आंख मिलाने में हिचकने वाले मंत्री भी अब मंत्रीपरिषद की बैठक में सरेआम भिड़ने लगे हैं। मुख्यमंत्री का इकवाल खतरे में पड़ गया है। इन परिस्थितियों से उबरने में मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देकर ब्रम्हास्त्र तो चलाया किंतु, अब यही गेम नीतीश कुमार के लिए उल्टा परने लगा है। मुझे कई विधायको ने बताया कि आज शाम विधायकदल की बैठक में एक बार फिर से नीतीश कुमार को ही नेता चुन लिया जायेगा। हालांकि, यह बात दीगर है कि नीतीश दुबारा मुख्यमंत्री बनेंगे या नही? जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नेतृत्व में बदलाव के पक्षधर हो गयें है। तेजी से बदल रहे समीकरण में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से बात करना चौकाता है। सवाल यही खत्म नही होता। वल्की, लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जदयू का राष्ट्रीय नेतृत्व बिहार में नए समीकरण तलाश रहा हैं। सोशल इंजीनियरिंग में माहिर नीतीश कुमार का जिद, बिहार में भाजपा के लिए जमीन तैयार करने में कारगार साबित हो चुका है। बहरहाल, नीतीश कुमार का यह मास्टर स्टाक नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य तय करने वाला है। मेरे समझ से राजनीति में जिद व द्वेश के लिए कोई स्थान नही होना चाहिए। अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहंूगा कि जो हो रहा है, वह बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

Vaishali

कौशलेन्द्र झा 
Party CANDIDATE NO. OF VOTES % OF VOTES
LJP Rama Kishor Singh 305450 - 32%
RJD Raghuvansh Prasad Singh 206183 - 22%
JD(U) Vijay Kumar Sahni 145182 - 15%
IND Annu Shukla 104229 - 11%
BSP Shankar Mehto 23677 - 2%
IND Dr. Md. Nabi Hasan 22455 - 2%
IND Balender Singh 15178 - 1%
IND Jitender Prasad 12369 1%
IND Ranjit Kumar Jha 11540 -1%
RHSD Md. Hasiv 11075 -1%
IND Md. Umar Ansari 8254 -0%
AAP Raj Mangal Prasad 7768 - 0%
IND Ram Pukar Rai 7182 - 0%
LPSP Vinod Pandit 6430 - 0%
NOTA NOTA 6060 -0%
RHKSP Mukesh Ram 5497 - 0%
IND Rameshwar Shah 5483 - 0%
SUCI(C) Indradev Rao 5218 - 0%
BMP Parmeshvar Ram 4000 - 0%
VSIP Md. Naushad 3866 - 0%
BJVP Jaynarayan Shah 3191 - 0%
IND Sandhya Devi 2983 - 0%
IND Lalji Kumar Rakesh 2667 - 0%

Wednesday, May 7, 2014

राजनीति में महिलाएं

 कौशलेन्द्र झा
राजनीति में महिलाओं पर होने वाली हिंसा को लेकर संयुक्त राष्ट्र और सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की रिपोर्ट चौंकाने वाली है, खासकर भारत को लेकर। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 45 फीसदी महिला प्रत्याशियों को हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जिस देश में लगभग आधी मतदाता महिलाएं हों, उस देश में आजादी के 67 साल बाद भी राजनीति में आने वाली महिलाओं पर हिंसा हमारे लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगाती है।
महिलाओं के अनुपात में उन्हें राजनीति में प्रतिनिधित्व मिलना तो दूर हिंसा के डर से उन्हें राजनीति में आने से रोकने की कोशिश खतरनाक संकेत है। आजादी के बाद से देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जोर-शोर से अभियान चलाए गए। सरकारों से लेकर राजनीतिक दलों और स्वयं सेवी संगठनों ने महिलाओं को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए माहौल बनाने के हर संभव प्रयास किए। लेकिन धरातल पर जो स्थिति है वह रिपोर्ट में सामने आई है। महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर देने की बातें तो सभी दल करते हैं लेकिन व्यवहार में इसके उलट देखने को मिलता है।
संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण देने का मामला सालों से लंबित पड़ा है। कारण साफ है कि कोई भी दल सच्चे मन से शायद यह नहीं चाहता कि राजनीति में महिलाओं को आरक्षण मिले। 49 फीसदी महिलाओं की संख्या के मुकाबले 15वीं लोकसभा में कुल 58 महिलाएं चुनकर आई थीं, जो सदन की संख्या का 11 फीसदी भी नहीं हैं। संसद में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिल जाए तो लोकसभा में 180 महिलाएं चुनकर आ सकती हैं। जिस दिन ऎसा हो पाएगा, तभी राजनीति में महिलाएं सुरक्षित हो पाएंगी।
महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में चुनकर आने का फायदा राजनीति के शुद्धिकरण के रूप में भी मिल सकता है। महिला प्रत्याशियों के चुनावी मैदान में उतरने से राजनीति में होने वाली हिंसा पर तो लगाम लगेगी ही, आरोप-प्रत्यारोप से गंदी हो रही राजनीति पर भी विराम लगेगा। दुनिया के दूसरे देशों में भी महिलाएं राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यूरोप और अमरीका में दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के मुकाबले राजनीति में रहने वाली महिलाओं को हिंसा का सामना नहीं करना पड़ता है। केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ सभी राजनीतिक दल समाज में व्याप्त इस बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने की ठान लें तो कोई कारण नहीं कि भारत की महिलाओं को भी राजनीतिक मैदान में हिंसा से छुटकारा नहीं मिल सके।

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Friday, May 2, 2014

भैयेजी जीतने की अग्रिम बधाई

कौशलेन्द्र झा
बात चली है चुनावी गर्मी की तो, बैठे बिठाए निठल्ले ठंडे-ठाये लोगों में पोलेटिक्स का करंट दौडऩे लगा है। जिसको देखो वो चुनाव में खड़ा होने की सोच रहा है, कुछ सोच ही रहे हैं, तो कुछ खड़े भी हो रहे हैं। ऐसे ही चुनाव में खड़े होने की तमन्ना वाले एक नेताजी से हमने पूछ लिया- भैयेजी, आप खड़े हो रहे हैं। वे बोले-जी हां, जी हां। हमने कहा-भैये जीतने की अग्रिम बधाई, तो वे बोले बधाई-वधाई तो ठीक है, पर एक बात बताएं हम कोई जीतने के लिए थोड़े ही इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं? हमारी मोटी बुद्घि में बात घुसी नहीं। हमने तपाक से पूछ लिया-अमां, जीतने के लिए नहीं खड़े हो रहे हैं, तो फिर किसलिए...?
हमारी बात को सुनकर पहले तो छुटभैये नेताजी को हमारी बुद्घि पर तरस आया, फिर अपने ज्ञान का पिटारा खोला और हमारे कंधे पर हाथ रखते हुए अपने मुख से ज्ञान उढ़ेलने लगे व बोले-हम- हम जीतने के लिए थोड़े ही खड़े हो रहे हैं, अरे कलमकार हम तो नाम के लिए खड़े हो रहे हैं, नाम के लिए। जीते या हारे जाए भाड़ में। इसी बहाने नाम हो जाएगा, कि हम इलेक्शन में खड़े हुए थे। आगे नेताजी समझाते हुए हमसे बोले- ...और खुदा न खास्ता मजाक मजाक में जीत गए तो भैये मजा ही मजा है। मैंने कहा- अच्छा तो ये बात है। अब हमें समझ में आया कि जगह-जगह इलेक्शन में केंडिडेटों की धड़ाधड़ भीड़ क्यों बढ़ रही है। हम तो समझे थे कि इत्ते सारे लोगों में अपने कस्बे, नगर, गांव के प्रति प्रेम उफान मार रहा है, तो कुछ काम करने के लिए लोग इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं, पर अब सबको समझ जाना चाहिए कि यहां काम की नहीं, नाम की मारामारी है।
भैये, ये जनता समझती नहीं, हर चुनाव में नेताओं पर भनभनाती है, कि काम क्या किया, काम क्या किया.... हमरे एक फ्रेन्ड बोलते हैं, काम बोलना चाहिए काम। वही बात इस मुई जनता के दिमाग में घुसी हुई है, काम बोलना चाहिए काम।
पर इस मुई जनता को क्या मालूम कि अपने नेताजी को काम धाम से कोई मतलब नहीं, नाम में इंन्ट्रेस्ट है। जो लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? वो जरा हमरे नेताजी से जाकर पुछिए, कि नाम में क्या रखा है? नाम की महिमा क्या है? अपने नेताजी का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, तो देश का नाम होगा।
पर, क्या करें नेताजी, ये जनता नाम की महिमा समझती ही नहीं, सब आप जैसे समझदार थोड़े ही हैं। पर नेताजी, आप समझना, आप तो समझदार है। भैये जी, आप जैसे सबको नाम का चस्का नहीं लगा है और जिस दिन आपकी कृपा से जनता को नाम का चस्का लग जाएगा, उस दिन सब काम धाम बंद। नाम चमकाने का काम शुरू। सुनकर के नेताजी बोले- वो सब तो खैर ठीक है। हम हमारा नाम और चमकाना चाहते हैं, इसलिए हमरे ऊपर वाले लीडर का मना रहे हैं। जरूर आईए।
तो भैया जी नेताजी ने हमें इन्वीटेशन दे दिया है। हम बड़े नेताजी का मनाकर आते हैं, तब तक आप नेता-नाम की महिमा समझिए और ज्यादा समझ में आ जाए, तो हमें भी समझाईए...। ठीक है ना...

खुली आंखों से सपना देखा।

कौशलेन्द्र झा
एक फ़िल्म आई थी परदेस.......... जी .. जी.. जी.. बिल्कुल वही शाह रुख खान वाली ..... उसमे एक लड़की थी रितु चोधरी जी हां वही जिसे सब महिमा चोधरी के नाम से जानते है याद है न परदेस की वो भोली भली सी लड़की .....जी तो अब इस तस्वीर को देखिये और बताइए क्या ये वही है ? आपको यकीं हो या न हो लेकिन बिल्कुल वही महिमा है ये वो भोली भली सी लड़की अब एक खतरनाक कातिल हसीना बन गई है हमारी कही बात पे यकीन नही होता ? तो अपनी आँखों पर यकीन कीजिये । वही महिमा आज मीनापुर आई थी। एक चुनावी जनसभा में। देवीजी क ा दर्शन हुआ। समझ में नही आता कि थैक्स किसे बोलूं? सीने अदाकारा महिमा को या उस नेताजी को, जिनके दिवा स्वप्न की वजह से मैंने अपनी खुली आंखों से सपना देखा।