Friday, April 25, 2014

मीडिया की काँव-काँव …

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
सुबह-सुबह मीडिया की काँव-काँव की शुरुआत टेलीविजन से साथ हो जाती है. एक ही बात बार-बार दोहराई जाती है. जोर-जोर से चिल्लाई जाता है. लोगों के कान में कर्कश आवाज़ घुसाई जाती है. मुद्दों का अभाव और दूर जाने की इच्छा का अभाव और संसाधनों की सीमितता गिनी-चुनी ख़बरों तक, गिने-चुने राज्यों तक, समिट जाती है. सुबह-सुबह कौवे का काँव-काँव के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भले हैं वो ग़रीब लोग जिनके घर में टेलीविजन नहीं है,. अच्छे हैं वो लोग जिनके घर में लोगों की मौत, दहशत और ख़ौफ़ के साथ सपनों की अन्जानी सी दुनिया लेकर आने वाला अख़बार नहीं आता. ख़ुश हैं वो लोग जो अपने काम में व्यस्त हैं. जिनके पास किसी की चुगली करने. किसी की पीठ पीछे बुराई करने की फुरसत नहीं है. जिनके काम से लोगों को लोगों की ज़िंदगी में थोड़ा सा बगदलाव आता है. थोड़ा सकारात्मक असर पड़ता है.
विरोध-समर्थन-तरफ़दारी-पक्षपात वाली राजनीति के प्रपंच से दूर रहने वाले वाकई ख़ुश हैं. क्योंकि उनती ज़िंदगी तमाशे को देखते हुए, तमाशा नहीं बनती. बदलाव के नारों के साथ तेज़ी-तेज़ी गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलती. वो जीवन और प्रकृति के गतिमान रंगों के साथ मन में होने वाले बदलाओं को महसूस करते हैं. प्रकृति को जीवन में घुसने देते हैं और ख़ुद भी प्रकृति के बदलाव में शरीक होते हैं. शामिल होते हैं. काँव-काँव में गहराई का अभाव है. तथ्यों की हैराफेरी है.
इस हेराफरी और तरफ़ादारी के खेल को समझने के लिए बड़ी वस्तुनिष्ठता की जरूरत है. जिसका निर्माण तमाम खूंटे से बँधे होने की बाध्यताओं से रस्सा तुड़ाने और स्वतंत्र तरीके से जीना ही हो सकता है. इसका कोई भी विकल्प जो हमारे लिए बेहतर हो हमें ख़ुद ही चुनना पड़ता है. तमाम व्यस्तताओं के बीच सुकून के लम्हे खोजना. तमाम आग्रहों और पूर्वाग्रहों की पिटारी को किनारे पटककर सुकून से बैठने का लम्हा भी यादगार होता है.
आद एक ही नाम, सत्ता, दल और विचार के समर्थन और विरोध की काँव-काँव सुनाई दे रही है. इस काँव-काँव से किसी की नींद ख़राब करने की बात हो रही है तो किसी का सुकून छीनने की कोशिश की जा रही है. आख़िर में महोदय ने निंदारस का पान करते हुए कहा कि हम निंदा करते हैं. लेकिन लोगों का दिन खराबह करनमे और लोगों को परेशान करने के लिए माफ़ी माँग लेने का हुनर भी काबिल-ए-तारीफ़ है. काँव-काँव से दो लम्हे छीन लेने वाले जज्बे को सलाम है. ऐसा जज्बा बना और बचा रहे, इस शुभकामना के साथ विदा.


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