Wednesday, April 30, 2014

चूहा-बिल्ली के खेल में उलझे राजनीतिक बयानवीर

कौशलेन्द्र झा 

नेताओं के बारे में हमेशा कहा जाता है कि वे जमीन से जुड़े होते हैं। हर नेता स्वयं भी यही साबित करने की कोशिश करता है कि वही सबसे ज्यादा जमीन से जुड़ा नेता है। हम सभी आम जन यह मानते आए हैं कि जमीन से जुड़े होने का मतलब नेताओं का आमजन और उनकी समस्याओं, हित अहित से जुड़ाव से होता है। लेकिन चुनावों के दौरान हमें हकीकत पता चलती है कि इसका मतलब तो यही होता है कि अपने कार्यकाल में किसी नेता ने जमीन से अपने स्वार्थ के लिए कितना कमाया।
अब देखिए न नेताओं के बीच आजकल जिस तरह चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है, उसकी जड़ें जमीन में ही हैं। खेल की शुरुआत गुजरात में मोदी सरकार द्वारा अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपतियों को नगण्य दामों पर जमीन देने के कांग्रेस के आरोपों से हुई, जिसके जवाब में भाजपा को एक अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जनरल ने एक बड़ा मुद्दा याद दिला दिया।
अखबार के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा जमीन का लेनदेन करते हुए कुछ ही वर्षों में एक ही वर्ष में एक लाख से तीन सौ करोड़ रुपए से ज्यादा के मालिक बन गए। अखबार में यह छपने के बाद से भाजपा हाथ धोकर सोनिया गांधी परिवार के पीछे पड़ गई। यहां तक कि दामादश्री के नाम से एक छोटी फिल्म ही बना डाली। साथ ही वाड्रा के कारनामों पर एक बुकलेट भी जारी कर दी।
भाजपा के इन हमलों का जवाब सोनिया गांधी और राहुल ने तो नहीं दिया लेकिन पति पर हमलों के जवाब में प्रियंका गांधी मैदान में उतरी और यहां तक कह बैठीं कि चुनाव में तिलमिलाए भाजपा नेता चूहों की तरह बिल से बाहर निकल आए हैं और हमारे परिवार पर निजी हमले करने लगे हैं। प्रियंका के बयान पर भाजपा नेताओं ने भी पलटवार किए और निजी हमलों के बयानों का नया दौर प्रारंभ हो गया। व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप किस हद तक लगेंगे यह नेता शायद स्वयं भी नहीं जानते। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन द्वारा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को कसाई कहना तो यही साबित करता है। हालांकि बाद में देश के ऊलजलूल बयानबीर लालू यादव ने भी ब्रायन के समान मोदी को कसाई कहते हुए ट्वीट किया। इसके पूर्व जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक बयान देते हुए कहा कि मोदी को वोट देने वालों को समुद्र में डूब मरना चाहिए। वे भाजपा नेता गिरिराज सिंह के बयान का जवाब दे रहे थे, जिसमें कहा गया था कि मोदी के खिलाफ वोट करने वालों को पाकिस्तान भेज देंगे। गिरिराज के इस बयान पर पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई और गिरफ्तारी की नौबत तक आई।
देखा जाए तो चुनाव ही वो काल है जब हमें नेताओं की असली औकात सामने दिखाई देती है। इस अवसर पर नेता इतने घटिया स्तर पर उतर आते हैं जिसकी कल्पना भी नहीं ‍की जा सकती। आम जनता लाचारी के साथ इन बयानवीरों को देखती रहती है। वह करे भी तो क्या। उस पर ये नेता (आडवाणी गुजरात में) कहते हैं कि वोट डालना अनिवार्य किया जाना चाहिए। ईवीएम में नोटा के विकल्प को भी हल नहीं माना जा सकता। हल तो सिर्फ यही है कि नेता अपना आचरण सुधारें और भारतीय संस्कृति के अनुसार देश को पुराना सम्मान और गौरव लौटाने के प्रयास करें।

.सिर्फ रस्म बनकर रह गया है मजदूर दिवस

कौशलेन्द्र झा 

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जिसको मई दिवस के नाम से जाना जाता है, इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय शुरू हुई थी, जब मजदूर मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और बाद में पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों की मौत हो गई, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। इसके बाद 1889 में पेरिस में अंतरराष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में जब फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसको अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, उसी वक्त से दुनिया के 80 देशों में मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा। भारत में 1923 से इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में समाजवाद की आवाज कम ही सुनाई देती है। ऐसे हालात में मई दिवस की हालत क्या होगी, यह सवाल प्रासंगिक हो गया है। हम ऐतिहासिक दृष्टि से 'दुनिया के मजदूरों एक हो' के नारे को देखें तो उस वक्त भी दुनिया के लोग दो खेमों में बंटे हुए थे। अमीर और गरीब देशों के बीच फर्क था। सारे देशों में कुशल और अकुशल श्रमिक एक साथ ट्रेड यूनियन में भागीदार नहीं थे।

Friday, April 25, 2014

कही ये आपको उल्लू तो नही बना रहें हैं..........

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
बात दिसम्बर 2011 की है। मैं मीडिया रत्न अबार्ड लेने देहरादून गया था। दिन भर चली अलंकरण समारोह के बाद शाम को लौट कर होटल आया। इसी होटल की गैलरी में राष्ट्रीय पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता से मिलने का मौका मिला। वे पंजाबी थी और अपने एक समर्थक को कह रहे थे कि आप जैसे चलाक इंसान को उसने टोपी कैसे पहना दिया? उस वक्त मैं इसका अर्थ समझ नही पाया। बाद में पता चला कि टोपी पहनाने को पंजाबी लोग उल्लू बनाना कहतें हैं।
तीन साल बाद आज वही टोपी याद आ गया है। हमारे लोकतंत्र के महापर्व में टोपी पहना देना आम बात हो गया है। आम आदम ने टोपी को चुनाव का बढि़या मुद्दा बना दिया है। आम आदमी तो लोगो को टोपी पहना ही रहा है। सच तो ये है कि कोई भी इस पुनीत कार्य में पीछे नही है। कांगे्रस गांधी टोपी और भाजपा की भगवा टोपी तक तो बात समझ में आती हैं। यहां तो समाजवादी भी टोपी पहनाने लगें हैं। भाई मेरे, कही ये टोपी पहना कर आपको उल्लू तो नही बना रहें हैं? सोच लीजिए। सोचने में जाता ही क्या है?

नेता और जनता का ‘रोमांस’

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
जब नेता और जनता के बीच मोहब्बत के चर्चे हों तो समझो चुनाव करीब आ गए हैं. नारों लगाती भीड़ के हाथों में पत्थर और डंडें हो तो समझो चुनाव आ गए हैं. पति एक पार्टी में और पत्नी दूसरी पार्टी में चले जाएं तो समझों चुनाव आ गए हैं. वोट और नोट के संबंधों पर विचार-विमर्श होने लगें तो समझो लोकतंत्र का त्योहार करीब आ गया है. यह बात दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के बारे में सच जान पड़ती है.
16वें लोकसभा चुनावों की तैयारियों का असर बढ़ती नक्सली गतिविधियों, धमाके में उड़ते स्कूलों, रैलियों में जुटती भीड़, पार्टी बदलते नेता, अभिनेता से नेता बनते फ़िल्मी दुनिया के नायक और खलनायक. संप्रदाय, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, शिक्षा, जागरूकता के आधार पर इतना साफ़ विभाजन पाँच सालों के अंतराल पर या बीच-बीच में होने वाले अलग-अलग चुनावों के दौरान ही नज़र आता है. चुनावों के दौर की ईमानदारी काबिल-ए-ग़ौर होती है. जनता और नेता अपनी पहचान जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, विचारधारा, पार्टी, मौकापरस्ती, व्यावहारिकता को गले लगाते प्रतीत होते हैं. नेताओं की सत्ता चरित्र सामने आता है.
विचारधारा का खूंटा तोड़कर भागते नेता बताते हैं कि यह धारा जब व्यक्तिगत तरक्की की राह में रोड़ बन जाय तो इससे उबर जाना बेहतर होता है. एक नाव डूबने लगे तो दूसरे पर सवार हो लेना अच्छा रहता है. लेकिन एक ही सीख हर किसी के लिए लागू नहीं होती. जो जनता के बीच मजबूत है. वह हमेसा राजनीति के इम्तिहान में अव्वल आता है. इतने सारे लोकसभा क्षेत्र हैं. अकेले भारत के सबसे बड़े आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं. इसका लाभ यहां के कद्दावर नेताओं को मिलता है.
कुछ नेताओं का तो सत्ता का फार्मूला काफ़ी सीधा है. पाँच साल के बाद पार्टी बदल लो, लोकसभा विधानसभा क्षेत्र बदलो, पैसा फूंको, जनता का वोट बटोरो और सत्ता का सुख भोगो. कुछ नेताओं ने इस फ़ार्मूले को बड़े अच्छे से साधा है. लेकिन हर किसी के लिए दौड़भाग वाली प्रतियोगिता का हिस्सा बनना आसान नहीं होता. लेकिन भारती. राजनीति के प्रोफ़ेशन के बारे में भी एक बात कभी-कभार सच लगती है कि तरक्की के लिए पार्टी बदलना और मंत्रालय तक पहुंचने के लिए मौका देखकर गुट बदलना कितना जरूरी होता है?
अभी भागते राजनेताओं की भगदड़ देखने लायक है. कौन किधर चला जाएगा, कुछ कहना मुश्किल है…ऐसा लगता है सारे नेताओं को भागने की बीमारी लग गई है…..कोई टिकट के लिए भाग रहा है, कोई वोट के लिए भाग रहा है, कोई चुनावी ख़र्चों वाले नोट के लिए भाग रहा है, कोई अपनी पार्टी छोड़कर…नई पार्टी की तरफ़ भाग रहा है,,,तो कोई विचारधारा का खूंटा तोड़कर भाग रहा है….इतनी भागमभाग का कोई लाभ नहीं…खरगोश वाली कहानी की तरह तेज़ भागदौड़ के खर्राटे वाली नींद का नज़ार भी देखने को मिलेगा.
अंत में सवाल रचनात्मक क्षेत्र के लोगों के राजनीति में पदार्पण का कि आख़िर देश की राजनीति में कलाकारों का क्या उपयोग हो सकता है?
अभिनेताः लोगों के बीच प्रचार के लिए विकास का अभिनय करेंगे.
गायकः विकास के ऐसे अनोखे गीत लिखेंगे कि सुनने वाले चौंक जाएं.
विदूषकः जनता को मुफ़्त में भद्दा मनोरंजन उपलब्ध करवाएंगे.
 

मीडिया की काँव-काँव …

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
सुबह-सुबह मीडिया की काँव-काँव की शुरुआत टेलीविजन से साथ हो जाती है. एक ही बात बार-बार दोहराई जाती है. जोर-जोर से चिल्लाई जाता है. लोगों के कान में कर्कश आवाज़ घुसाई जाती है. मुद्दों का अभाव और दूर जाने की इच्छा का अभाव और संसाधनों की सीमितता गिनी-चुनी ख़बरों तक, गिने-चुने राज्यों तक, समिट जाती है. सुबह-सुबह कौवे का काँव-काँव के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भले हैं वो ग़रीब लोग जिनके घर में टेलीविजन नहीं है,. अच्छे हैं वो लोग जिनके घर में लोगों की मौत, दहशत और ख़ौफ़ के साथ सपनों की अन्जानी सी दुनिया लेकर आने वाला अख़बार नहीं आता. ख़ुश हैं वो लोग जो अपने काम में व्यस्त हैं. जिनके पास किसी की चुगली करने. किसी की पीठ पीछे बुराई करने की फुरसत नहीं है. जिनके काम से लोगों को लोगों की ज़िंदगी में थोड़ा सा बगदलाव आता है. थोड़ा सकारात्मक असर पड़ता है.
विरोध-समर्थन-तरफ़दारी-पक्षपात वाली राजनीति के प्रपंच से दूर रहने वाले वाकई ख़ुश हैं. क्योंकि उनती ज़िंदगी तमाशे को देखते हुए, तमाशा नहीं बनती. बदलाव के नारों के साथ तेज़ी-तेज़ी गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलती. वो जीवन और प्रकृति के गतिमान रंगों के साथ मन में होने वाले बदलाओं को महसूस करते हैं. प्रकृति को जीवन में घुसने देते हैं और ख़ुद भी प्रकृति के बदलाव में शरीक होते हैं. शामिल होते हैं. काँव-काँव में गहराई का अभाव है. तथ्यों की हैराफेरी है.
इस हेराफरी और तरफ़ादारी के खेल को समझने के लिए बड़ी वस्तुनिष्ठता की जरूरत है. जिसका निर्माण तमाम खूंटे से बँधे होने की बाध्यताओं से रस्सा तुड़ाने और स्वतंत्र तरीके से जीना ही हो सकता है. इसका कोई भी विकल्प जो हमारे लिए बेहतर हो हमें ख़ुद ही चुनना पड़ता है. तमाम व्यस्तताओं के बीच सुकून के लम्हे खोजना. तमाम आग्रहों और पूर्वाग्रहों की पिटारी को किनारे पटककर सुकून से बैठने का लम्हा भी यादगार होता है.
आद एक ही नाम, सत्ता, दल और विचार के समर्थन और विरोध की काँव-काँव सुनाई दे रही है. इस काँव-काँव से किसी की नींद ख़राब करने की बात हो रही है तो किसी का सुकून छीनने की कोशिश की जा रही है. आख़िर में महोदय ने निंदारस का पान करते हुए कहा कि हम निंदा करते हैं. लेकिन लोगों का दिन खराबह करनमे और लोगों को परेशान करने के लिए माफ़ी माँग लेने का हुनर भी काबिल-ए-तारीफ़ है. काँव-काँव से दो लम्हे छीन लेने वाले जज्बे को सलाम है. ऐसा जज्बा बना और बचा रहे, इस शुभकामना के साथ विदा.


हक़ मिला, हक़ीक़त बदली क्या?

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ‘वेंटिलेटर’ पर हैं……..कुछ लोगों का कहना है कि चुनाव हैं. इसलिए रुपए की क़ीमतों में गिरावट का खेल, खेला जा रहा है….ताकि विदेशों में जमा ‘काले धन’ का थोड़े हिस्से से ‘चुनावी जंग’ जीती जा सके. ऐसा लगता है मानो मोहब्बत, जंग और चुनाव में सब जायज है. बहुत सारी चीज़े रणनीति बनाकर तय की जाती हैं और उसका दोष आंतरिक और वाह्य कारणों पर मढ़कर खुद को निर्दोष बताया जाता है.
किसानी की ‘सार्वजनिक उपेक्षा’ का सरकारी एजेंडा किसी से छुपा नहीं है. ऊपर से प्रधानमंत्री का बयान कि कृषि क्षेत्र से काफी उम्मीदे हैं. पहली पंचवर्षीय योजना के बाद से कृषि को हासिए पर ढकेलने के नीति आज भी जारी है. अब तो पीछे मुड़कर देखने का कोई सवाल ही नहीं है. भारतीय कृषि को मॉनसून का जुआ कहा जाता है. सरकार भी जुआ खेल रही है.
सरकार को पता है कि औघोगिक क्षेत्र की कोई लॉबी किसानों के लिए उनके ऊपर दबाव बनाने से रही. सबसे कमज़ोर स्थिति वाले लोगों को ही राजनीति में मोहरा बनाया जाता है. इसीलिए सारे मनमाने फैसले लिए जाते हैं. फसल का मूल्य निर्धारण हो, बढ़ती क़ीमतों पर लगाम लगाने के लिए विदेशों से आयात हो, ‘खाद्य सुरक्षा’ के नाम पर ‘खेती की उपेक्षा’ और बर्बादी का लोकलुभावन फैसला जो विकास के खेल में ‘आत्मघाती गोल’ साबित हो सकता है.
जब देश में अनाज नहीं होगा तो विदेशों से आयात क लोगों को इसकी पूर्ति करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. सारी फायदा विदेशी एजेंसियों को मिलेगा. क्या उस समय चालू खाते का तथाकथित घाटा, विपरीत भुगतान संतुलन नहीं बढ़ेगा? आर्थिक विकास के तमाम शब्दकोषों की आड़ में सरकार तमाम खेल, खेल रही है और परिणामों का तमाशा देख रही है.
गाँव में एक कहावत कही जाती है कि किसान तो ‘हरी दूब’ हैं. इनको चाहे जितना काटो फिर से पनप आते हैं. यह मुहावरा संभवतः कृषि क्षेत्र पर टिके उद्योगों जैसे चीन मिलों के कोर ग्रुप से बाहर निकला है, गन्ने की कम क़ीमतें देना. घटतौली करना और आसपास की जमीनों को औने-पौने दामों पर दबाव बनाकर खरीदने के किस्सों की भरमार है. उसी सोच की राह पर सरकारी नीतियों का निर्माण हो रहा है और लोगों को बताया जा रहा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक से किसानों का लाभ होगा. कितना लाभ हुआ है, अतीत इस बात का गवाह है, भविष्य भी देख लेते हैं.
इस बात के समर्थन में अर्थशास्त्रियों की एक लॉबी लंबे समय से काम कर रही है. 2008 में ऐसे ही एक अर्थशास्त्री को सुनने का मौका मिला. जिसमें उन्होंने कहा था कि किसानों को अपनी ज़मीन कंपनियों को बेचकर बच्चों को पढ़ाना चाहिए. लंबे समय तक लोगों का मानस रचने के काम के बाद सरकार विदेयक लेकर आ गयी है. पास भी हो गया है
दूसरी तरफ रिपोर्टें आ रही है कि गाँव में नौकरियों की कमी होगा. युवाओं को शहरों को ओर पलायन करना होगा. सरकार को गाँव के लोगों को गाँव में रोकने के लिए प्रयास करना चाहिए. इसके लिए कई सालों से ‘पूरा’ योजना के तहत शहरी सुविधाओं के झाँसे में गाँव के लोगों को फांसने का काम सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ कर रही है.


Tuesday, April 22, 2014

हम तो डूबेंगे ‘सनम’ तुमको भी ले डूबेंगे

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
‘हम तो डूबेंगे, औरों को भी डुबो देंगे.’ जी हां, बिहार के चुनावी महाभारत में कुछ इसी तर्ज पर कई उम्मीदवारों ने नाराज होकर चुनावी मैदान में खूंटे गाड़ दिए हैं. कुछ तो पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर मजबूरीवश अखाड़े में हैं तो कुछ अपनी उपस्थिति दर्ज कराके पार्टी के शीर्ष नेताओं को चुनौती दे रहे हैं. मकसद सिर्फ इतना कि हम तो डूबेंगे ही आपको भी डुबो देंगे. हालांकि जीत की हसरत सभी उम्मीदवारों की है और जब तक चुनाव परिणाम सामने नहीं आ जाता. किसी की दावेदारी कम नहीं आंकी जा सकती है. ऐतिहासिक भूमि वैशाली से चर्चा शुरू करें तो यहां जदयू के लिए पार्टी की बागी उम्मीदवार अनु शुक्ला परेशानी खड़ी कर रही हैं. सत्ताधारी जदयू ने यहां से विजय साहनी को उम्मीदवार बनाया है. स्थानीय विधायक अनु शुक्ला वैशाली से टिकट मांग रही थीं, किंतु टिकट नहीं मिला. अनु शुक्ला जदयू के ही दबंग पूर्व विधायक विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला की पत्नी हैं. अनु शुक्ला के बागी तेवर से जदयू को भूमिहारों का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. वैसे वैशाली संसदीय क्षेत्र से राजद के दिग्गज रघुवंश प्रसाद सिंह पिछले पांच लोकसभा चुनाव से विजय पताका लहराते आ रहे हैं. ऐसे में जदयू को युद्ध में भिड़ने के लिए नयी रणनीति पर विचार करना होगा. दूसरी तरफ भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन की तरफ से यह सीट लोजपा को मिली है. ज्ञात हो कि वैशाली जिले के अंतर्गत आने वाले हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान नए तेवर में मैदान में हैं

सवाल सबसे बड़े लोकतंत्र का.....

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  

कल रात एक चैनल पर समाचार वाचक अचानक गीत गाने लगा - उपर पान की दुकान की दुकान, नीचे भगवा की जुटान। हुआ यें कि हमारे केजरीवाल साहेब को बनारसी पान खाने की इच्छा हो गयी। तो बनारस के तंग गलियों की थकान मिटाने के लिए पहुंच गए बनारस के एक मसहूर पान के दुकान पर। वह दुकान उपरी मंजिल पर था और हमारे केजरीवाल साहेब अभी गिलोरी खाए भी नही कि कान में आवाज पड़ी, मोदी...मोदी....मोदी....। नीचे झांक कर देखा तो भगवा समर्थको की भीड़। हमारे केजरीवाल साहेब ने फ्लाइंग किस मारा और पिछले दरबाजे से खिसग गये।
पर ये भगवा वाले भी हद करतें हैं भाई। पहले से ही पिछले दरबाजे पर घात लगाए बैठे थे और निकलते ही अंडों की बौछार कर दी। एक खबर आई कि भाषण करने गए थे, भीड़ ने टमाटर दे मारा। वेचारे, समझ पाते उससे पहले ही पत्रकार जी पहुंच गए। भोंपू उनके मुंह से सटाया और सवाल...इस पर आपको क्या कहना है? जनाव, पहले टमाटर का दाग तो पोछ लेने देते। खैर...हमारे केजरीवाल साहेब भी मजे हुए खिलाड़ी हैं। कहने लगे कि ये बच्चें हैं। कल एक गांव में गया तो वहां भी मोदी मोदी हो रहा था। कागज का टुकड़ा पढ़ाया तो सभी केजरी केजरी करने लगे।
भाईयों, अब मेरे समझ में आया कि हमारा भारत महान कैसे है? कैसे हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है? दुसरे देश वाले चुनाव के दौरान अपनी राष्ट्रीय नीति, आर्थिक विकास और अपनी विदेश नीति को उछालतें हैं। हम चुनाव आतें ही उसकी पत्नी को ढ़ूढ़ निकालतें हैं। कौन किसका फोन टेप कर रहा है, निकाल लातें हैं। नेताजी के कितने बच्चें हैं? यदि नही है तो क्यों नही है? जीजाजी अमीर कैसे हो गए? नेताजी कुत्ता के पिल्ला हैं या कुत्ता का बड़ा भाई? राष्ट्रीय चैनल पर बैठ कर हमारे टीकाकार लगातार तीन रोज तक इसी विषय पर वहस करतें हैं। कौन जहर उगल रहा है और कौन जहर की खेती कर रहा है? इतना ही नही टाफी या गुब्बारा हाथ लग जाए तो एक सप्ताह तक उसको छोरते नही। दुनियां वालों अब समझ में आया कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र कैसे हैं?

ओपिनियन पोल

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
बिहार की सभी 40 सीटों पर मेरी पार्टी ही जितेगी। बिहार के सभी बड़े नेता इन दिनो ऐसा ही दावा करतें हुए अक्सर दीख जातें हैं। बिहार ही क्यू? यूपी, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भी इस तरह के दावेदारो की कमी नही है। राष्ट्रीय स्तर पर तो 300 सीट मिलने का दावा होने लगा। और यदि ओपिनियन पोल वाला सीट गिना दे तो यही नेता भड़क जातें हैं। कहने लगतें हैं कि बिका हुआ है। वोटर प्रभावित हो रहा है। आदि, आदि। भाई मेरे समझ में तो बिल्कुल नही आया कि ओपिनियन पोल से यदि वास्तव में वोटर प्रभावित होतें हैं, तो प्रभाव तो आपके दावों से भी पड़ता होगा। चलिए मान लेतें हैं कि ओपिनियन पोल वाले बिक चुकें हैं। पर, आपको किसने खरीदा? आप तो समझदार हैं। जानतें हैं कि इसका असर पड़ जाता है। फिर, संयम क्यों खो देतें हैं? क्या, प्रजातंत्र के इस महापर्व में पार्टी या नेता के संबंध में जानने का हक प्रजा को नही है? क्यों आप प्रजा को गुमराह करके सिर्फ अपनी बातों में उलझाए रखना चाहतें हैं। ये सच है कि कई बार ओपिनियन पोल गलत साबित हो चुका है। पर, यह भी तो सच हैं कि उसका एक आधार है। आपके दावों का आधार क्या हैं? मैं यह मानता हूं कि ओपिनियन पोल गुमराह कर सकता है। पर, यह भी सच हैं कि आप तो निश्चत रुप से गुमराह ही कर रहें हैं। आप बताइये कि प्रजातंत्र के इस महापर्व में प्रजा अपने नेताओं की औकाद का आकलन करे, तो कैसे करे? मैं जानता हूं कि आपके पास मेरे सवालो का कोई जवाब नही है। क्योंकि, सच तो यही है कि जनता का रहनुमा वास्तव में उसी जनता को गुमराह करके अपना उल्लू सिधा करना चाहता है और ओपिनियन से मतदाता की आंख कही खुल न जाये, इससे डरता है। लिहाजा, सभी नेता इसको बंद करने पर अमादा है। मेरी स्पष्ट राय हैं कि ओपिनियन पोल को बंद करने से बेहतर होगा कि उसको और अधिक वैज्ञानिक आधार देने पर विचार किया जाए। ताकि ओपिनियन पोल की विश्वसनियता बहाल हो सके और आवाम को समय रहतें सच्चाई का पता चल सके।

Friday, April 18, 2014

धर्मों में परिवर्तन के क्या कारण हैं


मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
क्या हिन्दू होना अपराध है। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि सभी धर्म के लोग भगवान् के ही बनाए हुए प्रक्रति का स्वरुप हैं। सबका मालिक एक है। लेकिन इनलोगों को हिन्दू धर्म से अन्य धर्मों में परिवर्तन होने के क्या कारण हैं इसपर बहस होनी चाहिए।
हम दुसरे धर्म का सम्मान करें लेकिन अपने धर्म को कैसे भूल जाए। लालच क्या नहीं करवा सकता।
कांग्रेस के 80% मंत्री धर्मपरिवर्तित ईसाई या मुसलमान है बस धोखे देने
को नाम ही हिन्दू की तरह है हिन्दू वोटरो को लुभाने के लिए….
• सबसे पहले सोनिया गांधी असली नाम एंटोनिया माइनो कट्टर कैथोलिक ईसाई
• राहुल गांधी असली नाम राउल विंची
• प्रियंका गांधी का पति राबर्ट वाड्रा कट्टर ईसाई
• प्रियंका के दो बच्चे रेहना और मिराया
• दिग्विजय सिंह ईसाई धर्म अपना चुका है
• छतीसगढ़ के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजित जोगी और उनका पूरा परिवार ईसाई धर्म
अपना चुका है
• कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदम्बरम ईसाई बन चुके है और उनकी पत्नी
नलिनी 167 ईसाई
मिशनरी एनजीओ की मालकिन है
• पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
केजी बालाकृषडन भी ईसाई धर्म अपना चुके है
• 2जी घोटाले का आरोपी ए राजा ईसाई है
• द्रमुक प्रमुख एम के करुणानिधि व उनका पूराखानदान ईसाई बन चुका है
• वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी, सुबोध कान्त सहाय, कपिल सिब्बल,
सत्यव्रत चतुर्वेदी, अंबिका सोनी,पीवी थामस, ए के एन्टोनी, जनार्दन
दिवेदी, मनीष तिवारी ये सभी ईसाई
धर्म अपना चुके है
• धर्म को अफीम मनाने वाले कम्युनिस्ट सीताराम येचूरी, प्रकाश करात,
विनायक सेन ईसाई है
• अरुंधति राय, स्वामी अग्निवेस, सारे कांग्रेसी पत्रकार ईसाई हो चुके है
• आंध्र प्रदेश के 150 से ज्यादा मंत्री ईसाई बन चुके है इसलिए आंध्र
प्रदेश मे सारे मंदिरो को तोड़ा जा चुका है ,
• बाकी बचे नेता मुस्लिम है जैसे सलमान खुर्सीद, अहमद पटेल इत्यादि ।
• आंध्र प्रदेश के वाईएसआर रेड्डी ईसाई है और उसका बेटा अनिल जो की ईसाई
मिशनरी समाज का सबसे बड़ा माफिया है,इसी अनिल पर यह भी आरोप है की धर्म
परिवर्तन के लिए जो कमीशन बाहर से आता है उसके लेनदेन संबंधी बँटवारे को
लेकर अनिल ने वाईएसआर केआई हत्या का षड्यंत्र रचा था । इसी अनिल ने पूरे
भारत के जनमानस
को ईसाई बनाने का ठेका लिया है । इसके पास 21 निजी हेलीकाप्टर है व खरबो
रुपये की संपति है इसनेकेवल हैदराबाद मे ही 100 से ज्यादा conversion
workshops लगा रखी है धर्म परिवर्तन के लिए । इसका ढांचा किसी बहुत बड़ी
एमएनसी कंपनी द्वारा बनाया गय जिसमे सीईओ से लेकर मार्केटिंग
professionals तक भर्ती किए जाते है । प्रत्येक ईसाई मिशनरी को टार्गेट
दिया जाता है की प्रति सप्ताह 10 हिन्दुओ को ईसाई बनानेका और कमीशन
दिया जाता है । औसतन 200 हिन्दुओ को ईसाई धर्म परिवर्तन न करने के कारण
जला दिया जाता है । यह सरकारी आंकड़ा है असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती
है

Wednesday, April 16, 2014

वोट के लिए जियारत, टिकट देने में सियासत

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
बिहार के 243 विधान सभा क्षेत्रों के 50 से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित हो सकता है। इन विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 प्रतिशत है। लगभग पचास से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में उनकी आबादी 10 से 17 प्रतिशत है। बिहार की कुल आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 16.5 है आबादी के लिहाज से देखें तो कम-से-कम बिहार विधान सभा में 38-40 मुसलमान प्रतिनिधियों को पहुंचना चाहिए, लेकिन पहुंचते हैं 24-25।
बिहार में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी 74 प्रतिशत नए विधान सभा क्षेत्र कोचाधमन और पुराने विधान सभा क्षेत्र अमौर में है। नए बने विधान सभा क्षेत्रों में बलरामपुर में लगभग 65 प्रतिशत और पुराने विधान सभा क्षेत्र जोकीहाट में मुसलमानों की आबादी 68 प्रतिशत है। बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, अररिया, कदवा, प्राणपुर, कोढ़ा और बरारी में तो मुस्लिम आबादी की तादाद अच्छी-खासी है। अजजा के लिए सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र मनिहारी में मुसलमानों की आबादी लगभग 41 प्रतिशत है।
पश्चिम चम्पारण के सिकटा और नरकटियागंज में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत और 29 प्रतिशत है। इसी तरह रामनगर (अजा), चनपटिया में 21 प्रतिशत और बेतिया में 27 प्रतिशत आबादी है। नौतन में 18 प्रतिशत तो बगहा में पंद्रह प्रतिशत है। पूर्वी चम्पारण के रक्सौल, नरकटिया और हरसिद्ध (अजा) और सुगौली में आबादी 24 प्रतिशत है। मधुबनी के राजनगर (अजा) में 14 प्रतिशत तो बिस्फी में 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसी तरह सीतामढ़ी के परिहार, सुरसंड, बाजपट्‌टी और सीतामढ़ी में आबादी 18 प्रतिशत से 32 प्रतिशत है। मनिहारी में 41 प्रतिशत तो बरारी में 31 और कोढ़ा में 33 प्रतिशत है। मुसलमानों की आबादी गौड़ाबौराम, दरभंगा ग्रामीण, अली नगर और बेनीपुर, जाले और केवटी में 22 से 32 प्रतिशत के बीच है।
गोपालगंज और बरौली में 23-24 प्रतिशत तो हथुआ विधान सभा क्षेत्र में मुसलमानों की 19 प्रतिशत आबादी बसती है। सीवान, रघुनाथपुर बड़हरिया में 21 प्रतिशत से 27 प्रतिशत आबादी बसती है। भागलपुर में 30 प्रतिशत, नाथनगर में 24 प्रतिशत, कहलगांव में 19 प्रतिशत, बांका के धेरैया में 18 प्रतिशत, बिहारशरीफ में लगभग 24 प्रतिशत और गया शहर में 25 प्रतिशत आबादी बसती है।
10 प्रतिशत से अधिक और 17 प्रतिशत से कम आबादी वाले क्षेत्र
बाल्मीकिनगर, बगहा, गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी, चिरैया, रीगा, बथनाहा, रून्नी सैदपुर, हरलाखी, बेलसंड, खजौली, बाबूबरही, राजनगर (अजा), झंझारपुर, फुलपरास, लौकहा, निर्मली, पिपला, सुपौल, त्रिवेणीगंज, बनमनखी (अजा), रूपौली, आलमनगर, बिहारीगंज, सिहेंद्गवर, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषि, कुशेश्वर स्थान (अजा), बेनीपुर, हायाघाट, बहादुरपुर, गायघाट, औराई, मीनापुर, सकरा (अजा), बोचहा (अजा), कुढनी, बरूराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, कुचायकोट, भोरे, जीरादेई, दरौंदा, महाराजगंज, एकमा, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, अमनौर और परसा। वैशाली, महुआ, पातेपुर (अजा), कल्याणपुर (अजा), वारिशनगर समस्तीपुर, मोरवा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी (अजा), खगड़िया, परबत्ता, बिहपुर, पीरपैंती (अजा), सुलतानगंज, अमरपुर, बांका, कटोरिया (अजजा), मुंगेर, बांकीपुर, फुलवारी (अजा), आरा, तरारी, चैनपुर, सासाराम, डिहरी, अरवल, औरंगाबाद, इमामगंज (अजा), बाराचट्‌टी (अजा), बेलागंज,वजीरगंज, हिसुआ, नवादा, गोविन्दपुर, सिकन्दरा (अजा), जमुई, झाझा, चकाई।


नेताजी शुरू हो गए


मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
अपनी फटफटिया से उतरते ही नेताजी शुरू हो गए। लालटेन की रौशनी में कमल पर दनादन तीर छोरने लगे। बनारस, बड़ोदरा, लखनउ जैसे चर्चित लोकसभा का समीकरण तो मानो नेताजी को जुवानी याद हो। बिहार के हर एक सीट का पुरा ब्योरा। उत्तर और दक्षिण भारत का अद्भूत ज्ञान। कहतें हैं कि 16 वीं लोकसभा का पुरा तस्वीर नेताजी के पाकेट में हैं। किसको कितना सीट मिलने वाला है, अंगूली पर गिना देंगे।
चौकिए नही, मैं दिल्ली के किसी टीबी स्टूडियों में बैठे राजनीतिक समीक्षक की बात नही कर रहा हंू। वल्की यह दृश्य है, मीनापुर विधानसभा क्षेत्र के एक छोटे से चौक का। मैं जिस नेताजी की बात कर रहा हूं, दरअसल वें चौथी फेल है। हां, दबंगयी में उनकी कोई सानी नही है। एक बार दारोगा जी की बांह मरोर चुकें हैं। लालटेन की रौशनी में अपना राजनीतिक भविष्य देखने वाले हमारे नेताजी आजकल तीर चला रहें है। हालांकि, लालटेन से मोह अभी भी बरकरार है। हों भी कैसे नही। कहतें हैं कि कमल को खिलने से रोकने के लिए तीर पर्याप्त नही है। जाहिर है, इसके लिए हाथ में लालटेन का होना लाजमी हो गया है।
आलम ये हैं कि तीर निशाने पर लगे या नही लगे। मंडली के लोग नेताजी का बखान करने में जुट जातें हैं। गदगद हुए नेताजी भी किसी को भी छारेने के मूड में नही है। चाहें वह मीडिया हो या ओपिनियन पोल। सच तो यही है कि टीबी पर लम्बी लम्बी वहस हो या अखबार में बड़ा इश्तेहार। गांव के चौपाल पर इसका कोई फर्क नही परता। शहर में बैठ कर खुद को राजनीति का जानकार होने का दंभ भरने वाले। क्या आपको पता है कि गांव का बेमुकुट गोपाल आपको बिका हुआ मान रहें हैं।

Monday, April 14, 2014

पाकिस्तान में आदमी का मांस खाते पकडे गए दो नरभक्षी भाई

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
एक चौंकाने वाली घटना में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में दो भाइयों को आदमी का मांस खाने के आरोप में पकड़ा गया है. ये दोनों भाई 2011 में भी इसी आरोप में पकड़े जा चुके हैं. इनके पास से एक बच्चे का सिर भी बरामद किया गया है. भक्कर जिले के छोटे कस्बे दरया खान के आरिफ और फरमान को स्थानीय कब्रिस्तान से लायी गयी लाश खाने के कारण पहली बार अप्रैल 2011 में गिरफ्तार किया गया था. पकड़े जाने से पहले उन लोगों ने कथित तौर पर करीब 150 शवों को निकालकर उसका मांस खाया था. पुलिस ने आज उनके घरों पर छापा मारा और एक बच्चे का सिर बरामद किया. ‘एक्सप्रेस न्यूज’ की खबरों के मुताबिक, भक्कर के डीपीओ आमिर अब्दुल्लाह के मुताबिक आरिफ को गिरफ्तार कर लिया गया और उसने मानव मांस खाने की बात स्वीकार की जबकि उसके भाई फरमान को पकड़ा नहीं जा सका. फरमान की तलाश में अभियान चलाया जा रहा है. पाकिस्तान में नरभक्षण के खिलाफ कोई विशेष कानून नहीं है इसलिए पहले उन्हें पाकिस्तान दंड संहिता की धारा एमपीओ के तहत गिरफ्तार किया गया बाद में 295ए के तहत मामला दर्ज किया गया.

पाकिस्तान में थाने पहुँची लड़की पर छोड़े कुत्ते

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
नवाए वक़्त के संपादकीय में एक ऐसी घटना का ज़िक्र है जिसमें इंसाफ़ के लिए पुलिस थाने पहुँची एक लड़की पर कुत्ते छोड़ दिए गए. मामला पंजाब प्रांत के सुखेकी इलाक़े का है, जहां थाने में पहुंची लड़की पर विरोधी पक्ष ने कुत्ते छोड़ दिए और पुलिस तमाशा देखती रही. इस घटना पर दुख जताते हुए अख़बार कहता है कि लड़की को न सिर्फ़ कई चोटें आईं, बल्कि वो वहीं बेहोश होकर गिर भी गई.
वहीं औसाफ़ के पहले पन्ने पर छपी एक तस्वीर में एक व्यक्ति को सलाखों के पीछे बैठे देखा जा सकता है और हवालात के बाहर उसके दो छोटे-छोटे बच्चे बैठे हैं. इस व्यक्ति पर अपनी पत्नी के क़त्ल का आरोप है, लेकिन अख़बार का फोटो कैप्शन है कि हवालात के बाहर यतीमों की तरह बैठे इन बच्चों का क्या क़सूर है.

वैशाली लोकसभा

 मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
 वैशाली लोकसभा क्षेत्र के धरमपुर गांव में हुयी एक छोटी सी बैठक आने वाले दिनो में बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत हैं। दरअसल 13 अप्रैल को वैशाली के प्रबुद्ध यादवों ने बैठक करके राजद के सांसद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा रघुवंश प्रसाद सिंह के सभी कार्यक्रमो का वहिष्कार करने का निर्णय किया है। राजद का परंपरागत वोट कहलाने वाला यह समाज अपने स्वजातीय उम्मीदवार के लिए पहले भी राजद का दामन छोरता रहा है। किंतु, पहली बार बिजातीय उम्मीदवार के लिए बगावत बिहार की राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होने वाला है। पूर्व मंत्री की अध्यक्षता में हुयी बैठक में दर्जनो पंचायत प्रतिनिधियों की मौजूदगी को हल्के में नही लिया जा सकता है। गौरतलब बात यें हैं कि इस बैठक में न सिर्फ मीनापुर वल्की, कांटी, साहेबगंज, बरुराज व पारू के प्रतिनिधियों का शामिल होना साबित करता है कि आक्रोश की चिंगारी कमोवेश पुरे वैशाली लोकसभा क्षेत्र में फैला हुआ है। कहतें हैं कि धरमपुर की एक छोटी सी बैठक वैशाली की राजनीति में भूचाल खड़ा कर सकता है।

Tuesday, April 8, 2014

Kaushlendra Jha

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Kaushlendra Jha Minapur

Kaushlendra Jha
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बिहार में मुसलमानों की स्थिति हो रही बेहतर: जस्टिस सच्चर

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
पूरे देश में मुसलमानों की स्थिति दलितों से भी बदतर है। किसी राष्ट्र का मौलिक कर्तव्य सबको बराबरी का हक देना होता है। ये बातें सोमवार को राजधानी के मौर्या होटल में जस्टिस राजिंदर सच्चर ने कहीं। वे तौहिद एजुकेशनल ट्रस्ट की ओर से ‘बिहार में अल्पसंख्यक मुसलमानों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान’ विषय पर आयोजित सेमिनार में भाग लेने आए थे
जस्टिस सच्चर ने कहा कि कमेटी द्वारा रिपोर्ट पेश करने के बाद बिहार में मुसलमानों के हालात में बदलाव हुए हैं। पिछले कुछ सालों में सुधार भी हुआ है। अगर कोई सरकार अल्पसंख्यकों को बराबरी का हक नहीं दे सकती, तो वहां समावेशी विकास संभव नहीं। उन्होंने बाबरी विध्वंस को लोकतंत्र का काला दिन करार दिया और कहा कि सरकार का कोई कौम नहीं होता। कोई भी धर्म एक-दूसरे से खुद को श्रेष्ठ प्रमाणित नहीं करता। जो धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है वह संविधान के खिलाफ है और उसे देशद्रोही भी कहा जाए तो गलत नहीं। उन्होंने दंगे के बाद क्षेत्र विशेष के अध्ययन के बाद आई रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि पुलिसिया जिम्मेदारी संभालने में अल्पसंख्यकों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाए जाने की अपील की। जस्टिस सचर ने कहा कि अल्पसंख्यक मुसलमान राष्ट्र के विकास में उतना ही भागीदारी रखते हैं, जितना बहुसंख्यक हिंदू व अन्य समुदाय। कार्यक्रम में मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मो. इश्तियाक ने कहा कि सच्चर कमेटी ने देश में अल्पसंख्यक मुसलमानों के वास्तविक सूरत-ए-हाल को यथावत प्रस्तुत किया। यह काबिल-ए-तारीफ है। मुख्य अतिथि मौलाना मजहरुल हक अरबी व फारसी विवि के कुलपति प्रो. एजाज अली अरशद ने कहा कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों के बाद हालात सुधरे हैं। बिहार में हाल के दिनों में अल्पसंख्यक छात्रों को प्रोफेशनल कोर्स में भी वजीफे मिलने शुरू हुए हैं।

औरंगाबाद में बम विस्फोट, डिप्टी कमांडेट समेत तीन शहीद

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा
वाले प्रशासन व सम्य समाज के लिए शर्म की बात नही तो और क्या है? शर्म इसलिए भी कि घटना के बाद नेता एक दुसरे पर आरोप मढ़ कर अपना पल्ला झाड़ने में लगे हैं। क्या डिप्टी कमांडेंट इंद्रजीत सिंह के इलाज में कोताही बरते जाने की उच्चस्तरीय जांच होगी? क्या दोषी लोगो को चिन्हित करके उसे सजा दिया जायेगा? ऐसे कई सवाल मेरे जेहन को परेशान कर रहा है। मैं कौशलेन्द्र झा इस अमानवीय घटना की भर्त्सना करते हुए, इसकी उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग करता हूं। दरअसल सोमवार को बरंडा मोड़ के पास सड़क के किनारे खोदे गए एक गड्ढे से निकले तार वहां देखे गए जिससे यहां लैड माइन्स होने की आशंका जताई गई। इस सूचना पर कोबरा के सहायक कमांडेंट टी.एन. सिंह ढबिरा थाने के थानाध्यक्ष अमर चौधरी के साथ बाइक पर सवार होकर उक्त स्थल पर पहुंचे। यहां तार और जमीन में दबे बम की जांच के लिए कुछ बैट्री और अन्य उपकरण मंगाये गए व जांच के बाद हैवी बम होने की बात कह कर सीआरपीएफ के कुछ जवानों को यहां माॠनिटिरग में लगा दिया गया। इसी दौरान कुछ जवानों ने बम को डिफ्यूज करने की कोशशि की और वह फट गया। इस विस्फोट में दो सीआरपीएफ जवान राजस्थान निवासी पवन कुमार एवं आंध्र प्रदेश निवासी टी. पन्ना राव की घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि नौ अन्य लोग घायल हो गए।

Sunday, April 6, 2014

...जब फिसली नेता जी की जुबान

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
लोकसभा चुनाव के पहले सभी राजनीतिक दल शुचिता का दंभ भरते हैं, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे मुद्दे गायब होते जा रहे हैं और नेताओं की जुबान फिसलने लगी है. मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए जाति, कौम के नाम पर बदजुबानी जंग तेज होती जा रही है.
इसमें कोई एक दल या कोई खास नेता शामिल नहीं है, सभी दलों के लोग वोट बटोरने के लिए बदजुबानी जंग में एक-दूसरे के आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं. जनता भी इन भाषणों को सुनकर नेताओं के हां में हां मिला रही है और तालियां बजा रही है.
महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर जनता का गुस्सा जैसे ठंढा हो चला है, तो दलबदल करने वालों को सबक सिखाने की कसमें टूटने की दहलीज पर खड़ी हैं.
बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने बिहार दौरे के दौरान यदुवंशी नेताओं के नाम पर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव पर निशाना साधा और कहा कि ये यदुवंशियों के नेता उस कांग्रेस के साथ हैं, जिसकी सरकार पशुओं के मांस का व्यापार फैलाने में लगी है. मोदी ने इसे 'गुलाबी क्रांति' तक की संज्ञा दे डाली.
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद भी भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह के पार्टी छोड़ देने को राजपूत जाति से जोड़कर भाजपा पर हमला कर रहे हैं. वे कहते हैं कि बीजेपी राजपूत की दुश्मन है, अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में लालू के भाषण मंदिर-मस्जिद पर टिक जाते हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने बिहार दौरे में बीजेपी को आंखों में धूल झोंकने वाला और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मुखौटा बदलने वाला करार दिया .
जदयु के नेता भी गुजरात में हुए इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर गुजरात सरकार पर हमला कर रहे हैं तो मुख्यमंत्री नीतीश कह रहे हैं कि देश के अल्पसंख्यक बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी से डरते हैं.
खुफिया एजंसियों द्वारा जमुई के जदयू प्रत्याशी और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी पर चुनाव में मदद पहुंचाने के लिए नक्सलियों से सांठ-गांठ का आरोप लगने के बाद जदयू ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेवार बता दिया.
अब दिलचस्प बात यह है कि इस चुनाव में किसी प्रत्याशी पर खुले तौर पर नक्सलियों से मदद मांगने की बात सामने आई है और उसके बचाव में उनका दल सामने आ गया है.

कौशलेन्द्र झा

कौशलेन्द्र झा

Friday, April 4, 2014

तुम्हारी याद में ........

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा
कलम चलती है तो दिल की आवाज़ लिखता हूं, गम और जुदाई के अंदाज़ ए बयान लिखता हूं। रुकते नहीं हैं मेरी आंखों से आंसू, मैं जब भी उनकी याद में अलफ़ाज़ लिखता हूं।
अब और क्या लिखू़ .....? क्योंकि.......
आंखों से आंसू न निकले तो दर्द बड़ा हो जाता है। उनके साथ बिताया हुआ हर पल की याद बड़ा हो जाता है। शायद वो हमें अभी तक भूल गए होंगे। मगर अभी भी उसका चेहरा मुझे ख्वाबों में नज़र आता है।
ये मेरे हमराज..........
वक़्त गुज़रता रहा पर सांसे थमी सी थी। मुस्कुरा रहे थे हम, पर आंखों में नमी सी थी। साथ हमारे जहां था सारा, पर न जाने क्यों मुझे तुम्हारी कमी सी थी। 

बुखारी ने चुनाव में कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 


सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद छिड़ी सियासी बहस के बीच जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के समर्थन का शुक्रवार को ऐलान किया। उन्होंने कहा कि देश में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए यह फैसला करना पड़ा है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की बजाय तृणमूल कांग्रेस को वोट देने की अपील की।
बुखारी ने सांप्रदायिकता को भ्रष्टाचार से भी ज्यादा खतरनाक करार देते हुए कहा कि इस समय सबसे बड़ा सवाल देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता का है।
उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा कि सोनिया गांधी से सांप्रदायिक दंगों, सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को लागू करने तथा मुसलमानों की जानमाल की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विस्तृत बातचीत हुई।
इसके साथ ही शाही इमाम ने ममता बनर्जी के कार्यों की तारीफ करते हुए धर्मनिरपेक्ष लोगों से पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की बजाय तृणमूल कांग्रेस का साथ देने की अपील की। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की सरकार ने मुसलमानों की समस्याओं के समाधान के लिए कुछ कार्य किए हैं।
धार्मिक गुरु होने के बावजूद राजनीति करने के आरोपों के संदर्भ में शाही इमाम ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है।

Wednesday, April 2, 2014

लोकतंत्र का महापर्व लोकसभा चुनाव

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
साथियों मित्रों, लोकतंत्र का महापर्व लोकसभा चुनाव शुरू हो चुका है। हमारे रहनुमा, राह दिखाने को निकल पड़ें हैं। भ्रष्ट्राचार, मंहगाई और बेरोजगारी मुद्दा नही रहा। जातिवाद, सम्प्रदाय वाद और क्षेत्रवाद फिर से हावी है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और यहां के महान मतदाता, क्या आपको याद है कि वर्ष 1948 में कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने संपूर्ण कश्मीर ही नही, वरण तिब्बत को भी भारत में विलय की घोषणा की थी। क्योंकि, उस वक्त तिब्बत भी महाराजा के अधीनस्थ राज्य हुआ करता था। बावजूद इसके आज तिब्बत चीन के अधीन कैसे? संपूर्ण कश्मीर का बड़ा भाग आजाद कश्मीर आज पाकिस्तान के कब्जें में हैं। हमारे कब्जें वाले अरुणाचल प्रदेश पर चीन गिद्ध दृष्टि गड़ाए बैठा है। लद्दाख के हमारे टेरोट्री पर चीन ने सैनिक हैलीपैड बना लिया है। इतना ही नही वल्की लद्दाख और अरुणाचल में बार बार चीनी सैनिको का घुसपैठ जारी है। बंगलादेश की सीमा सटे हमारे पश्चिम बंगाल में लगातार अवैध घुसपैठ जारी है। श्रीलंका की तामिलटाईगर की तपीश से हमारा तामिलनाडू झुलश रहा है। आजादी के वक्त डालर का मुकावला करने वाला हमारा रुपये आज 64 रुपये तक लुढ़क चुका है।
बावजूद इसके इन तमाम मुद्दो पर हमारे रहनुमा चुप क्यों हैं? रहनुमाओं को छोरिए, वह तो है ही हमारा सेवक। मालिक तो हम है। सवाल भी यही है कि हम चुप क्यों हैं? क्योंकि, बड़ी ही चालाकी से हमें जाति और सम्प्रदाय में बांट कर बाकि मुद्दो से अलग कर दिया गया है। साथियों, चुनाव राष्ट्र का है और मुद्दा स्थानीय। यह महज संयोग नही, वल्की साजिश है। यदि समय रहतें हम इसको समझ नही पाये तो, विश्व के पैमाने पर पिछड़ते रहेंगे। समय हाथ से निकल गया तो जाति व सम्प्रदाय के ठेकेदार काम नही आयेंगे। सोचिए ! मुझे आपके प्रतिक्रया का इंतजार रहेंगा।