Thursday, March 27, 2014

लोकतंत्र का महापर्व या लोकतंत्र का बलात्कार

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
दोस्तों, बिहार में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद पूरे देश में चुनाव आचार संहिता लागू है। आये दिन निर्वाचन आयोग की राज्य इकाई के द्वारा तरह-तरह की कार्रवाइयां किये जाने का दावा किया जा रहा है। ताज्जूब इस बात का है कि राज्य सरकार खुले आम आदर्श चुनाव आचार संहिता का बलात्कार कर रही है और निर्वाचन आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
राज्य सरकार ने आनन-फ़ानन में कैबिनेट की बैठक बुलायी और ग्यारह लोकलुभावन प्रस्तावों पर अपनी सहमति व्यक्त की। इन फ़ैसलों में नये सड़कों, पुल-पुलियों के निर्माण, सड़कों के चौड़ीकरण से लेकर सेवा एवं भर्ती नियमावली में संशोधन किये जाने का फ़ैसला तक शामिल है। जबकि आदर्श आचार संहिता में राज्य सरकार द्वारा ऐसी घोषणाओं पर प्रतिबंध लगाया गया है।
बिहार में आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन केवल राज्य सरकार कर रही है, ऐसी बात भी नहीं है। तमाम राजनीतिक दलों के द्वारा खुलेआम जाति और धर्म के आधार पर मतदाताओं से वोट करने की अपील की जा रही है। आश्चर्य तो तब होता है जब नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति भी बिहार की धरती पर आकर जाति के आधार पर वोट मांगता है। भाजपा के लोग चाय बेचने वाले अति पिछड़े के बेटे को वोट देने की बात कहते हैं।
अब एक उदाहरण और देखिये कई प्रत्याशियों ने मंदिर-मस्जिद जाकर माथा टेका है। जबकि आदर्श चुनाव आचार संहिता में स्पष्ट रुप से इस बात का प्रावधान किया है कि प्रत्याशी धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नहीं करेंगे।
स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाला मीडिया भी जमकर लोकतंत्र का हनन कर रहा है। पेड न्यूज आप्ने चरम पर है। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव की सारी दलीलें बेकार हैं। वैसे यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस देश में लोकतंत्र के महापर्व के नाम पर लोकतंत्र का बलात्कार करने का दौर चल रहा है।

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