Tuesday, March 25, 2014

मुजफ्फरपुर : समाजवाद की धरती पर समाजवादियों को चुनौती

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
मुजफ्फरपुर की धरती केवल लीची के लिए ही मशहूर नहीं है। समाजवाद के लिए भी यह सबसे ऊर्वर व उपजाऊ है। प्रमाण यह है कि वर्ष 1977 के बाद यहां हुए दस लोकसभा चुनावों में गैर समाजवादियों को केवल एक बार जीत मिली। वह भी वर्ष 1984 में जब पूरे देश में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ रही थी। मौजूदा दौर में कभी समाजवादियों की धरती रही मुजफ्फरपुर में जातिवाद राजनीतिक समीकरण का मुख्य अव्यव है।
साठ के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने मुसहरी प्रखंड में भूमि सुधार के जरिए समाज को नयी चेतना देने का प्रयास किया। इसके पहले विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी मुजफ्फरपुर में सबसे अधिक सफल हुआ। वर्ष 1977 का चुनाव पूरे देश में परिवर्तन लेकर आया। गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल पूरे फार्म में नजर आये। मुजफ्फरपुर में भी बाहरी होने के बावजूद जार्ज फर्नांडीस बतौर लोकदल प्रत्याशी विजयी रहे। उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह को हराया। इस चुनाव में श्री फर्नांडीस को 78.23 फीसदी और श्री सिंह को 12.32 फीसदी वोट मिले। वर्ष 1980 का चुनाव वर्ष 1977 के चुनाव के ठीक विपरीत था। पूरे देश में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को लायेंगे’ का नारा असर दिखा रहा था। लेकिन मुजफ्फरपुर की जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ। श्री फर्नांडीस एक बार फिर विजयी रहे। हालत यह रही कि कांग्रेस यहां मुख्य मुकाबले से बाहर थी। दूसरे नंबर पर जनता पार्टी के दिग्विजय नारायण सिंह रहे। हालांकि वर्ष 1984 में कांग्रेस फिर से अस्तित्व में लौटी और ललितेश्वर प्रसाद शाही जीतने में कामयाब हुए। उन्होंने कैप्टन जयनारायण निषाद को हराया था जो उस समय लोकदल के प्रत्याशी थे। इसके बाद मुजफ्फरपुर के राजनीतिक फलक से कांग्रेस पूरी तरह गायब हो गयी। वर्ष 1989 के चुनाव में जार्ज फर्नांडीस फिर वापस लौटे और बतौर जनता दल उम्मीदवार लगातार दो बार चुनाव जीतने में कामयाब रहे। वर्ष 1991 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के रघुनाथ पांडे को हराया।
वहीं वर्ष 1996 में लालू प्रसाद ने बतौर जनता दल उम्मीदवार कैप्टन जयनारायण निषाद को मैदान में उतारा। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि जार्ज फर्नांडीस तब नीतीश कुमार के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन कर चुके थे। इस चुनाव में कैप्टन निषाद ने समता पार्टी के उम्मीदवार हरेंद्र कुमार को लगभग 13 फीसदी मतों के अंतर से पराजित किया। वर्ष 1998 के चुनाव में भी लालू प्रसाद ने कैप्टन जयनारायण निषाद में विश्वास व्यक्त किया और मुजफ्फरपुर की जनता ने भी। वहीं वर्ष 1999 में कैप्टन निषाद ने राजद छोड़ जदयू की सदस्यता ले ली। नये दल के प्रत्याशी के रूप में भी वे लगातार तीसरी बार जितने में कामयाब रहे। उन्होंने राजद के महेंद्र साहनी को हराया। इस जीत के बाद उन्हें केंद्र की एनडीए सरकार में मंत्री बनने का सौभाग्य भी मिला। लेकिन वर्ष 2004 में जार्ज फर्नांडीस ने पिछले दरवाजे के बजाय मुख्य द्वार से संसद पहुंचने की इच्छा व्यक्त की तब जदयू ने उन्हें मुजफ्फरपुर से अपना उम्मीदवार बनाया। राजद के भगवान लाल साहनी ने उन्हें जबरदस्त टक्कर दी। इस चुनाव में श्री फर्नांडीस को 47.2 फीसदी वोट और श्री साहनी को 45.97 फीसदी वोट मिले। वहीं वर्ष 2009 के चुनाव में जदयू ने जार्ज फर्नांडीस से किनारा कर लिया और टिकट के हकदार एक बार फिर कैप्टन निषाद बने। नीतीश कुमार के प्रभाव के कारण इन्हें जीत भी मिल गयी। इस चुनाव में उन्हें 1 लाख 95 हजार 91 वोट मिले वहीं राजद-लोजपा गठबंधन के उम्मीदवार भगवान लाल साहनी को 1 लाख 47 हजार 282 वोट मिले।
बहरहाल, इस बार चुनावी समीकरण में उलट-पुलट हो चुका है। कैप्टन निषाद ने जदयू से विद्रोह कर भाजपा का दामन थाम लिया और भाजपा ने भी उनके पुत्र अजय निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया है। जबकि राजद-कांग्रेस गठबंधन ने अखिलेश प्रसाद सिंह को मैदान में उतार कर एक बार फिर भूमिहार समाज के मतदाताओं को साधने का प्रयास किया है। वहीं जदयू द्वारा विजेंद्र चौधरी को टिकट देने का मन बनाया है। उसके निशाने पर बड़ी संख्या में अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं। हालांकि श्री चौधरी के नाम पर जदयू में फूट मची है। बदली परिस्थितियों में जाति का खेल सिर चढ़कर बोल रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार समाजवादियों की धरती के लोग क्या फैसला सुनाते हैं।

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