Sunday, March 30, 2014

पश्चिम चंपारण : पाला बदलने के साथ ही बदल गयी राजनीति

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
तीन वर्षों के बाद पूरे देश में एक खास जश्न मनाया जाएगा। यह जश्न होगा महात्मा गांधी के चंपारण पहुंचने के सौ साल पूरे होने की खुशी में। आये दिन महात्मा गांधी के नाम को लेकर मशहूर इस अति विशेष लोकसभा क्षेत्र का चरित्र गांधीवाद से बिल्कुल पृथक है। यह भी एक संयोग ही है कि इस क्षेत्र में अति पिछड़ा वर्ग अन्य जाति एवं समुदायों से अधिक प्रभावी है। अति पिछड़ा वर्ग में भी वैश्य समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है। यही कारण है कि इस समुदाय के प्रतिनिधि ने पांच बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का गौरव हासिल किया है। वर्तमान सांसद डा. संजय जायसवाल के पहले उनके पिता डा. मदन प्रसाद जायसवाल ने गांधी के कर्मभूमि पर भगवा झंडा फहराने में सफलता हासिल किया था। पिता के निधन के बाद डा. सजय जायसवाल ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वर्ष 2009 में सीट जीतने में कामयाब रहे।
वर्ष 2009 में विपरीत परिस्थतियां होने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि उस समय फिल्म निर्देशक प्रकाश झा मैदान में जमे थे। हालांकि श्री झा ने पहले भी यहां का सांसद होने के लिए एड़ी चोटी का असफल जोर लगाया था। लेकिन वर्ष 2009 में वे राजद और लोजपा के संयुक्त उम्मीदवार थे। इसके अलावा बसपा के शम्भू प्रसाद गुप्ता के अलावा कांग्रेस की ओर से लालू प्रसाद के साले अनिरूद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधू यादव भी मैदान में खड़े थे। डा. संजय जायसवाल के लिए सकारात्मक यह था कि विपक्ष पूरी तहर बिखरा था। इसका लाभ उन्हें मिला। उन्होंने 1 लाख 98 हजार 778 मत हासिल किया जबकि दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रकाश झा को 1 लाख 51 हजार 438 मत मिले थे। श्री झा की जीत में सबसे बड़े खलनायक अनिरूद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधू यादव थे जिनके नाम पर उन्होंने अपनी एक फिल्म में एक किरदार का नामकरण किया था। श्री यादव ने 70001 वोट हासिल कर श्री झा को हराने में सफलता हासिल की।
वर्ष 1992 में नये परिसीमन से पहले पश्चिम चंपारण की राजनीति का रंग और ढंग दोनों अलग था। वर्ष 1992 में बाबरी विध्वसं के बाद गांधी की कर्मभूमि पर भगवा झंडा शान से लहराया। भाजपा के डा. मदन प्रसाद जायसवाल ने वर्ष 1996, वर्ष 1998 और वर्ष 1999 में लगातार तीन बार जीतने का कीर्तिमान बनाया। हालांकि वर्ष 2004 में भाजपा के ‘इंडिया शाइनिंग’ का जादू पूरे देश के जैसे पश्चिम चंपारण में भी नहीं चला। राजद के रघुनाथ झा ने डा. जायसवाल को हराने में कामयाबी हासिल की। श्री झा को 37.13 फीसदी और डा. जायसवाल को 32.8 फीसदी वोट मिले थे।
वहीं वर्ष 1992 के पहले इस सीट पर गांधी और जेपी के अनुयायियों के बीच ही संघर्ष हुआ करता था। मसलन जेपी के अनुयायी रहे फजलूर रहमान ने वर्ष 1977 में बतौर लोक दल प्रत्याशी जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार केदार पांडे को हराया था। जबकि वर्ष 1980 में श्री पांडे ने श्री रहमान को हराकर अपना बदला ले लिया। वर्ष 1984 के चुनाव में एक नया परिवर्तन यह आया कि जेपी के संपूर्ण क्रांति का राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया और वामपंथ ने अपना प्रभावकारी हस्तक्षेप किया। वर्ष 1984 में पीताम्बर सिंह और वर्ष 1989 में अब्दुल मोगनी कैफी ने सीपीआई उम्मीदवार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराया और दोनों बार सीपीआई दूसरे स्थान पर रही।
बहरहाल, इस बार राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। प्रकाश झा ने लोजपा का दामन छोड़ जदयू का दामन थामा है। वहीं दूसरी ओर राजद और कांग्रेस गठबंधन ने अपना दावा ठोंक रखा है। कांग्रेस ने अनिरूद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधू यादव को पार्टी से निकाल दिया है। जातीय समीकरणों के हिसाब लड़ाई भाजपा, राजद और जदयू के बीच होना तय है। कांग्रेस के साथ गठबंधन होने की स्थिति में कांग्रेस भी मुकाबले में साझेदार हो सकती है। हालांकि इसकी स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है।

Saturday, March 29, 2014

भला मैं चुप कैसे बैठू...?

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
साथियों मित्रों, लम्बे अर्से से इस देश की परंपरा रही है कि चुनाव का विगुल बजतें ही नेताजी खुद को विकास पुरु ष और बिरोधियों को निकम्मा साबित करने में लग जातें हैं। देश के महान मतदाता को भी अपने अपने क्षेत्र की समस्या याद आने लगता है। ऐसे में
भला मैं चुप कैसे बैठू?
मुझे भी कु छ याद आने लगा है। वैशाली को बुद्धिस्ट र्सिकट और रेल लाइन से जोड़ना याद आने लगा है। आपको कुछ याद आया? पिछले दिनो घोषणा हुई थी कि हाजीपुर-वैशाली-सुगोली रेल लाईन का सर्वेक्षण हो गया है। हाजीपुर वैशाली, सुगौली रेलवे लाइन की ३२४ करोड़ रुपये की योजना है। लेकिन अभी तक कुछ हुआ क्या? वैशाली भगवान बुद्ध की कर्मभूमि है। भगवान महावीर की जन्मभूमि है। लछवी गणतंत्र यानी जनतंत्र की भी जन्म भूमि है। फिर बुद्धिस्ट र्सिकट का मामला किधर चला गया?
बंद पड़े चीनी मिल और बूढ़ी गंडक नदी पर डुमरिया पुल को छोर देतें हैं। लेकिन लीची, केला व अन्य सब्जी के भंडारण हेतु बनने वाले कोल्ड स्टारेज का क्या करें? बाढ़ और सुखाड़ पर लच्छेदार भाषण देने वालों को याद है क्या कि मीनापुर में बूढ़ी गंडक का वाया तटबंध 12 किलो मिटर में खुला छोर दिया गया है। वैशाली में 90 प्रतिशत लोग कृषि पर आधारित है। बावजूद इसके सिंचाई का क्या प्रावधान है? बताना परेगा क्या? इसमें दो राय नही है कि विकास हुआ है। पर, आज भी गांव की सड़कें चलने लायक है क्या? आजादी के सात दशक बाद भी गांव के 95 प्रतिशत लोगो तक शुद्ध पेयजल का नही पहुंचना मुद्दा क्यों नही बनता है? भ्रष्ट्राचार तो गंगाजी के समान पवित्र हो चुका है। मौका मिलतें ही यहां सभी डुबकी लगाना चाहतें हैं। किंतु, चुनाव के इस महापर्व में महज थोड़े से वोट के लिए हम जाति व सम्प्रदाय को हवा देकर राष्ट्र को कमजोर नही कर रहें हैं क्या? सोचिए! मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

जातीय चौसर पर फिर बिहार की राजनीति

                                        मीनापुर कौशलेन्द्र झा
जाति आधारित राजनीति की जमीन रहे बिहार में एक बार फिर लोकसभा चुनाव के लिए नेता जातीय समीकरण बनाने की कोशिश में हैं। शुरू में विकास के नाम और दुहाई पर वोट मांगने वालों की राग अब जातीय हो गई है।
प्रत्येक सीट पर उतारे गए उम्मीदवारों के नाम पढ़कर भी इस समीकरण का एक खाका आसानी से दिखाई देता है। यहां जातियों को लेकर 'माई' (मुस्लिम -यादव), 'लव-कुश' , 'डीएम' , एसडीएमवीएस , महादलित जैसे समीकरण भी बनाए गए।
प्रदेश में जातीय विकास की राजनीति इस कदर हावी है कि शुक्रवार को कभी बिहार के पांच दिन के मुख्यमंत्री रहे सतीश प्रसाद सिंह ने यह कहते हुए भाजपा से इस्तीफा दे दिया कि पार्टी ने वायदे के मुताबिक कुशवाहा समाज के लोगों को टिकट नहीं दिया। कुछ दिन पहले जदयू छोड़ने वाले साबिर अली ने कहा था कि पार्टी ने उन्हें इसलिए टिकट नहीं दिया कि वो मुसलमान हैं। कुर्मी होते तो ऐसा नहीं होता।
जाति आधारित राजनीति के पुराने खिलाड़ी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद सबको 'अहीर मरोड़' का दांव बता और समझा रहे हैं। कुर्मी बहुल इलाकों में उनकी सफाई होती है-'कुर्मी भाइयों, मैं हमेशा आपके दिल में रहा हूं। कुछ लोगों ने साजिश कर आपको मुझसे दूर करने की कोशिश की है।' सवर्ण जातियों को लेकर लालू आजकल कुछ ज्यादा आग्रही हैं। उनका कहना है कि 'मैंने कभी नहीं कहा कि भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्माण, लाला) को साफ करो।'
दरअसल, नेता जातीय बयानों की आड़ में अपने काम और वादे को छुपा लेते हैं। जातीय संगठन टिकट के लिए पार्टियों पर दबाव बनाने का चरण पूरा कर चुके हैं। अब फतवा का दौर चल रहा है जिसमें 'जाति तोड़ो-जनेऊ तोड़ो' जैसे नारों से हवा बनाने की कोशिश हो रही है।

Friday, March 28, 2014

मधुबनी : टिकी रहेंगी सबकी निगाहें

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
मिथिलांचल क्षेत्र का सबसे अहम सीट मधुनबी लोकसभा संसदीय क्षेत्र चुनाव से पहले ही चर्चा में है। हालांकि इस क्षेत्र के लिए पूर्व सांसद व कांग्रेसी उम्मीदवर डा. शकील अहमद ने राजद के अब्दुलबारी सिद्दीकी को दिये जाने को लेकर हामी भर दी है। मधुबनी पर निगाहें टिकी रहने की एक और वजह यह भी है कि वर्ष 1998 के बाद एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार भाजपा विजयी होती रही है। हालांकि वर्तमान सांसद हुकुमदेव नारायण यादव तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं लेकिन लगातार दूसरी बार जीतने का कारनामा नहीं दिखा सके हैं।
श्री यादव ने वर्ष 1977 में लोक दल के उम्मीदवार के रूप में सीपीआई के भोगेन्द्र झा को पराजित किया था। तब उन्हें 42.86 फीसदी वोट मिला था और भोगेन्द्र झा को 30.65 फीसदी। लेकिन वर्ष 1980 के कांग्रेसी लहर ने समाजवादियों और वामपंथियों दोनों को परास्त कर दिया। कांग्रेस के शफीकुल्लाह अंसारी ने सीपीआई के भोगेन्द्र झा को रोमांचक मुकाबले में हराने में सफलता हासिल की। रोमांचकता का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि श्री अंसारी को 39.3 फीसदी और श्री झा को 38.62 फीसदी वोट मिले थे। भोगेन्द्र झा ने वर्ष 1984 के कांग्रेसी लहर में भी कांग्रेस को भरपूर चुनौती दी। हालांकि उन्हें कांग्रेस के अब्दुल हन्नान अंसारी ने परास्त किया। इस बार जीत का अंतर दोगुने से अधिक था।
भोगन्द्र झा ने वर्ष 1989 में मधुबनी सीट जीतने में कामयाबी हासिल की। उन्होंने अब्दुल हन्नान अंसारी को करीब दोगुणा वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद वर्ष 1991 में हुए चुनाव में भी श्री झा ने बिहार के मुख्यमंत्री रहे डा. जगन्नाथ मिश्रा को हराकर जीत हासिल की। जबकि वर्ष 1996 में सीपीआई के चतुरानन मिश्र ने भाजपा उम्मीदवार हुकुमदेव नारायण यादव को पराजित किया। वामपंथियों के लिए यह जीत आखिरी जीत साबित हुई। वर्ष 1998 में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित होकर रह गया। कांग्रेस के डा. शकील अहमद ने भाजपा के हुकुमदेव नारायण यादव को हराया। डा. अहमद को 39.78 फीसदी और श्री यादव को 37.48 फीसदी वोट मिले। हालांकि एक वर्ष बाद यानी वर्ष 1999 में हुए चुनाव में श्री यादव ने डा. अहदम को हराकर उनसे मधुबनी सीट छीन ली और केंद्र में मंत्री बनने में सफलता हासिल की। लेकिन वर्ष 2004 के चुनाव में एक बार फिर डा. अहमद बीस साबित हुए। श्री यादव पराजित हो गये।
वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में स्थिति बिल्कुल अलग थी। अलग इस मायने में कि मैदान में चार बड़े पहलवान जमे थे। राजद-कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं होने के कारण अब्दुल बारी सिद्दीकी मैदान में जुटे थे। डा. शकील अहमद के अलावा सीपीआई डा. हेमचंद्र झा भी मौजूद थे। विजयश्री भाजपा के हुकुमदेव नारायण यादव को मिली। उन्हें 1 लाख 64 हजार 88 वोट प्राप्त हुआ था। जबकि दूसरे नंबर पर राजद के अब्दुलबारी सिद्दीकी थे जिन्हें 1 लाख 54 हजार 165 वोट हासिल हुआ था। डा. शकील अहमद 1 लाख 11 हजार 423 मत मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे।
बहरहाल, एक बार फिर वर्ष 2009 वाली स्थिति बनती जा रही है। पूरे दृश्य में एक अंतर है। जदयू और भाजपा अब अलग-अलग हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम की कल्पना आसानी से की जा सकती है। हालांकि इसमें अभी कई और पेंच हैं, जिनकी सच्चाई लोगों के सामने आनी बाकी है।

Thursday, March 27, 2014

शाम होते ही पहुंचने लगा था नक्सली जथा

मीनापुर कौशलेन्द्र झा। नक्सलियों की ओर से बुधवार की मध्य रात्रि से प्रस्तावित 24 घंटे के बिहार बंद के दौरान गड़बड़ी फैलाने के लिए पार्टी का सशस्त्र दस्ता बुधवार की शाम करीब 7.30 बजे ही धरमपुर नारायण चौर में पहुंच चुको था। गुरुवार की सुवह गांव के एक बालक ने यह खुलासा किया। रेल विभाग के पीडब्ल्यूआई अवधेश कुमार ने भी 70 से 80 पुलिस वर्दीधारी सशस्त्र नक्सलियों के शाम साढ़े 7 बजे ही घटनास्थल पर पहुंचने की पुष्टि की है।  पुलिस की वर्दी पहने ये नक्सली हाथ में बंदूक और पीठ पर बैग लिए थे। लड़के की मानें तो बुधवार की शाम जब वह चौर से लौट रहा था तभी उत्तर दिशा से आ रहे दस्ते की उसपर नजर पर गयी। नक्सलियों ने उसे दो थप्पर जड़कर भगा दिया। फिर इसके बाद क्या हुआ, किसी को नहीं पता है। दरअसल घटनास्थल से करीब 300 मीटर पूरब उत्तर की दिशा में एक आरा मिल है और करीब 500 मीटर पश्चिम धरमपुर नारायण गांव है। करीब 500 मीटर पुरब एक चिमनी भी है पर विस्फोट की आवाज किसी ने नहीं सुनी। घटनास्थल से आधा किलोमीटर पश्चिम सड़क किनारे घास काट रही एक महिला की मानें तो पिछले दो रोज से यहां अनजान लोगो की आवाजाही थी। जांच में जुटे जीआरपी के अधिकारी बताते हैं कि विस्फोट में प्रयुक्ज्त छोटा सिलेण्डर बम था और इसकी कमजोर क्षमता होने के कारण पटरी को अधिक नुकसान नहीं हुआ है।

बात नही हुई

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
कोशिश तो की बहुत, पर मुलाकात नही हुई। अफसोस है की उनसे कभी बात नही हुई।
दुनिया सो रही है, हो के बेखबर। मेरी बहुत दिनो से कोई रात नही हुई।
चुप हो गये मेरे अश्को को देख कर वो लोग। जो कह रहे थे की इस बरस कोई बरसात नही हुई।
लिखी है मैने कितनी गज़लें तेरी याद में। मगर अफसोस है की तुझसे कभी बात नही हुई।

लोकतंत्र का महापर्व या लोकतंत्र का बलात्कार

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
दोस्तों, बिहार में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद पूरे देश में चुनाव आचार संहिता लागू है। आये दिन निर्वाचन आयोग की राज्य इकाई के द्वारा तरह-तरह की कार्रवाइयां किये जाने का दावा किया जा रहा है। ताज्जूब इस बात का है कि राज्य सरकार खुले आम आदर्श चुनाव आचार संहिता का बलात्कार कर रही है और निर्वाचन आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
राज्य सरकार ने आनन-फ़ानन में कैबिनेट की बैठक बुलायी और ग्यारह लोकलुभावन प्रस्तावों पर अपनी सहमति व्यक्त की। इन फ़ैसलों में नये सड़कों, पुल-पुलियों के निर्माण, सड़कों के चौड़ीकरण से लेकर सेवा एवं भर्ती नियमावली में संशोधन किये जाने का फ़ैसला तक शामिल है। जबकि आदर्श आचार संहिता में राज्य सरकार द्वारा ऐसी घोषणाओं पर प्रतिबंध लगाया गया है।
बिहार में आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन केवल राज्य सरकार कर रही है, ऐसी बात भी नहीं है। तमाम राजनीतिक दलों के द्वारा खुलेआम जाति और धर्म के आधार पर मतदाताओं से वोट करने की अपील की जा रही है। आश्चर्य तो तब होता है जब नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति भी बिहार की धरती पर आकर जाति के आधार पर वोट मांगता है। भाजपा के लोग चाय बेचने वाले अति पिछड़े के बेटे को वोट देने की बात कहते हैं।
अब एक उदाहरण और देखिये कई प्रत्याशियों ने मंदिर-मस्जिद जाकर माथा टेका है। जबकि आदर्श चुनाव आचार संहिता में स्पष्ट रुप से इस बात का प्रावधान किया है कि प्रत्याशी धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नहीं करेंगे।
स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाला मीडिया भी जमकर लोकतंत्र का हनन कर रहा है। पेड न्यूज आप्ने चरम पर है। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव की सारी दलीलें बेकार हैं। वैसे यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस देश में लोकतंत्र के महापर्व के नाम पर लोकतंत्र का बलात्कार करने का दौर चल रहा है।

साइकिल पर निकले शहर के कोतवाल

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
सूबे में सुशासन है। इस क्रम में शहर के हालचाल की जानकारी लेने पटना के सीनियर कोतवाल मनु महाराज साइकिल पर सवार होकर निकले। इस दौरान हार्डिंग पार्क के पास एक दारोगा विपिन कुमार ने उन्हें आम आदमी की औकात बता दी।
दरअसल मनु महाराज कल साइकिल पर सवार होकर शहर की सैर पर निकले। हार्डिंग पार्क के पास गश्ती कर रही एक पुलिस टीम के पास पहुंचकर उन्होंने आम आदमी के रुप में अपने बेटे के गुम होने की बात कही। इस पर मौके पर तैनात दारोगा ने उन्हें झिड़क दिया। इस पर उन्होंने प्राथमिकी दर्ज करने की गुहार लगायी। दारोगा आगबबूला हो गया और उसने अपनी भाषा में डांटते हुए कहा कि भागता है कि नहीं यहां से…। इस पर मनु महाराज जब अपने असली रुप में आये तब दारोगा के होश फ़ाख्ता हो गये। सीनियर एसपी ने मौके पर ही दारोगा विपिन कुमार को निलंबित करने का आदेश दिया।

वैशाली : छठी बार ताजपोशी की तैयारी या परिवर्तन की बारी

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
संपूर्ण विश्व में पहली लोकतंत्र को साकार करने का गौरव वैशाली की धरती को जाता है। कभी लिच्छवी वंश ने लोकतंत्र की स्थापना वैशाली में की थी। बाद में जनता के बूते राज चलाने का सिद्धांत पूरे विश्व में फैला। वर्ष 1977 के पहले इस क्षेत्र में कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन बाद में पूरी तस्वीर ही बदल गयी। वर्ष 1984 में हुई लोकसभा चुनाव को अपवाद मानें तो अबतक हुए चुनाव में समाजवादियों की जीत बदस्तूर जारी है। वर्ष 1989 के बाद तो वैशाली की जनता ने जनता दल के उम्मीदवारों (बाद में राष्ट्रीय जनता दल बना) को ही विजयी बनाया है। वर्ष 1996 से लेकर अबतक हुए पांच लोकसभा चुनावों में जीत डा. रघुवंश प्रसाद सिंह को मिली है। इस बार भी वह राजद से उम्मीदवार बने हैं।
उधर डा. सिंह की राह रोकने के लिए जदयू और भाजपा गठबंधन ने जातिगत समीकरणों के तहत अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं। मसलन जदयू ने विजय सहनी को उम्मीदवार बनाया है वहीं भाजपा ने यह सीट लोजपा के खाते में डाल दिया है। लोजपा ने इस सीट से बाहुबली रामा सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है। रामा सिंह जाति के राजपूत हैं और भाजपा+लोजपा गठबंधन के निशाने पर वैशाली जिले के सवर्ण मतदाता हैं। हालांकि इस क्षेत्र में भूमिहार समाज के मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका निभाती है और लोजपा को यकीन है कि इस समाज का वोट उसे ही मिलेगा।
वहीं जदयू के निशाने पर अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं। नये परिसीमन के बाद इस संसदीय क्षेत्र में अति पिछड़ा वर्ग की भूमिका बढ़ी है। इसके अलावा जदयू के निशाने पर राजद का माई समीकरण भी है। लिहाजा वह भी जीत की दावे ठोंक रही है।
असल में जदयू और लोजपा की यह राजनीतिक चाल अप्राकृतिक नहीं है। पिछली बार वर्ष 2009 में हुए चुनाव में यह तथ्य सामने आया था। हालांकि राजद के उम्मीदवार डा. रघुवंश प्रसाद सिंह विजयी थे लेकिन उन्हें जदयू के बाहुबली विजय कुमार शुक्ला ऊर्फ मुन्ना शुक्ला (अब जेल में बंद) ने नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। इन दोनों के बीच मतों का अंतर केवल 22,324 मतों का था। स्थानीय समीकरणों के हिसाब से श्री शुक्ला को अपने स्वजातीय मतदाताओं के अलावा भाजपा कोटे के मतदाताओं और अति पिछड़ा समाज के मतदाताओं का वोट प्राप्त हुआ था। इसके अलावा जदयू ने कई विधानसभा क्षेत्रों में राजद के माई समीकरण में सेंध लगाने में सफलता हासिल की थी।
इस बार का चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली बार दूसरे स्थान पर रहे विजय कुमार शुक्ला गोपालगंज जिले के जिलाधिकारी रहे जी. कृष्ण्ौय्या की हत्या के मामले में जेल की सजा काट रहे हैं। वहीं उनकी पत्नी अनु शुक्ला जो स्वयं जदयू की विधायक हैं और जदयू द्वारा विजय सहनी को उम्मीदवार बनाये जाने का विरोध कर रही हैं। राजनीति बड़ी तेजी से बदलती जा रही है। राजनीतिक गलियारे में चल रही इस कयासबाजी को आधार मानें तो इस बार वैशाली में लोकसभा चुनाव दिलचस्प रहने की उम्मीद की जा सकती है।
हालांकि इससे पहले के चुनावों पर नजर डालें तो यहां के चुनाव मध्यम दर्जे के दिलचस्प साबित हुए हैं। मध्यम दर्जे के दिलचस्प का मतलब यह कि विजयी रहने वाले उम्मीदवार और दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार के बीच औसत अंतर करीब दस फीसदी रहा है। वर्ष 1989 में उषा सिंह ने बतौर जनता दल प्रत्याशी जीत हासिल की थी। तब उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार किशोरी सिन्हा को पराजित किया था। इस चुनाव में दोनों को क्रमश: 62.84 फीसदी और 32.5 फीसदी वोट मिले थे। इसके बाद वर्ष 1991 में हुए चुनाव में जीत जनता दल के शिवशरण सिंह को मिली। तब पूर्व सांसद उषा सिन्हा ने कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंका था। इसके बाद वर्ष 1996 में जनता दल ने डा. रघुवंश प्रसाद सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया। उन्होंने इस क्षेत्र में जीतने का सिलसिला पहली बार समता पार्टी के उम्मीदवार वृषिण पटेल को हराकर शुरू किया। इस चुनाव में इन दोनों के बीच मतों का अंतर कुल पड़े वोटों का करीब 9 फीसदी था। वर्ष 1998 में हुए चुनाव में एक बार फिर वृषिण पटेल की हार हुई और डा. रघुवंश प्रसाद सिंह जीतने में कामयाब रहे। वहीं वर्ष 1999 के चुनाव में बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने डा. सिंह को कड़ी चुनौती दी। हालांकि जीत डा. सिंह को ही मिली। वर्ष 2004 में हुए चुनाव में जदयू ने बाहुबली विजय कुमार शुक्ला ऊर्फ मुन्ना शुक्ला में अपना विश्वास व्यक्त किया लेकिन उसका यह तीर भी बेकार साबित हुआ। डा. रघुवंश प्रसाद सिंह जीतने में कामयाब रहे। वहीं वर्ष 2009 के चुनाव में भी कमोबेश यही कहानी दुहरायी गयी।
बहरहाल, वैशाली में इस बार के चुनाव में कुछ नये ट्विस्ट यानी रहस्यमयी मोड़ आने की संभावनायें हैं। इन संभावनाओं की उत्पत्ति का श्रेय बिहार सरकार के कद्दावर मंत्री व वैशाली जीतने का सपना देख रहे वृषिण पटेल को जाता है जिन्हें उनकी ही पार्टी ने बेटिकट कर दिया है। अपनी ही पार्टी के इस रवैये से नाराज श्री पटेल ने खुल्लमखुला विद्रोह करने के संकेत दिये हैं। लिहाजा समीकरणों में फेरबदल संभव है। हालांकि यह फेरबदल किसे लाभ पहुंचायेगा और किसे नुकसान यह तो वैशाली की जनता ही बतायेगी।

Tuesday, March 25, 2014

दरभंगा : फिर पुराने मोड़ पर राजनीति

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
बिहार में बंगाल का द्वार कहा जाने वाला दरभंगा जिला अपने मैथिली पहचान के लिए पूरे देश में मशहूर है। यहां की सामाजिक बुनावट राजनीति का मूल आधार है। यही बुनावट वर्ष 1977 से लेकर अबतक यहां के प्रतिनिधियों का निर्धारण करती आयी है। विशेष सामाजिक संरचना के कारण ही यहां राजनीति में केवल दो ध्रुव हैं। एक ब्राह्म्ण और दूसरा मुसलमान। इस बार भी सभी प्रमुख दलों ने इसी संरचना के आधार पर अपने मोहरों को मैदान में उतारा है। मसलन राजद-कांग्रेस गठबंधन ने चार बार सांसद रह चुके अली अशरफ फातमी को एक बार फिर आजमाया है वहीं भाजपा ने निवर्तमान सांसद कीर्ति झा आजाद पर अपना दांव खेला है। जबकि जदयू ने भी संजय झा को मैदान में उतारकर इसी सामाजिक संरचना को सम्पुष्ट किया है। यानी कुल मिलाकर दरभंगा की राजनीति एक बार फिर से उसी मोड़ पर खड़ी है।
वर्ष 1989 से पहले दरभंगा में ब्राह्म्णों का कब्जा था। ब्राह्म्णों के वर्चस्व का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1977 के गैर कांग्रेसी लहर होने के बावजूद लोकदल ने किसी गैर ब्राह्म्ण को मैदान में उतारने का जोखिम नहीं उठाया। लोकदल प्रत्याशी सुरेंद्र झा सुमन ने तब कांग्रेस के धाकड़ नेता माने जाने वाले राधानंदन झा को हराया। इस चुनाव में श्री सुमन को 73.57 फीसदी वोट और श्री झा को 22.74 फीसदी वोट मिले। वर्ष 1980 में चुनावी लड़ाई की रंगत बदली। समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार हुकुमदेव नारायण यादव ने कांग्रेसी हरि नाथ मिश्रा को कड़ी टक्कर दी। लेकिन हराने में कामयाब नहीं हो सके। वर्ष 1984 में भी ब्राह्म्णों का कब्जा दरभंगा सीट पर बरकरार रहा। लोकदल के उम्मीदवार विजय कुमार मिश्रा ने कांग्रेस के हरिनाथ मिश्रा को पराजित कर सीट कांग्रेस के जबड़े से निकालने में सफलता हासिल की।
वर्ष 1989 का चुनाव दरभंगा लोकसभा क्षेत्र के लिए अहम साबित हुआ। तब जनता दल के शकील रहमान ने पूरी लड़ाई को नयी दिशा दे दी। माई समीकरण ने अपना अस्तित्व दिखलाया और श्री रहमान कांग्रेस के नागेंद्र झा को हराने में कामयाब रहे। वर्ष 1991 में जनता दल ने अली अशरफ फातमी को अपना उम्मीदवार बनाया और जीत माई समीकरण की हुई। ब्राह्म्ण फिर हारे। उनके हारने और श्री फातमी के जीतने का सिलसिला लगातार तीन चुनावों में जारी रहा। वर्ष 1996 में श्री फातमी ने भाजपा के दिनकर कुमार झा और वर्ष 1998 में पंडित ताराकांत झा को हराया। लेकिन वर्ष 1999 में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद और भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य रहे कीर्ति आजाद को अपना उम्मीदवार बनाया। उस समय जदयू के नीतीश कुमार का गठबंधन भाजपा के साथ था। यह गठबंधन लालू प्रसाद के माई समीकरण पर भारी पड़ा और श्री फातमी चुनाव हार गये। लेकिन श्री फातमी ने वर्ष 2004 में भाजपा को हराने में कामयाबी हासिल की। इस चुनाव में श्री फातमी को 56.08 फीसदी और श्री आजाद को 37.27 फीसदी वोट मिले। वर्ष 2009 का चुनाव परिसीमन लेकर आया। परिसीमन के कारण दरभंगा लोकसभा क्षेत्र के भौगोलिक स्वरूप में परिवर्तन तो हुआ लेकिन इसका कोई असर यहां के सामाजिक बुनावट पर नहीं पड़ा। भाजपा ने एक बार फिर कीर्ति झा आजाद को उम्मीदवार बनाया और वे सफल हुए। इस चुनाव में उन्हें 2 लाख 39 हजार 256 वोट मिले। जबकि श्री फातमी को 1 लाख 92 हजार 814 मत। इस चुनाव में राजद को कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं होना महंगा पड़ा। वहीं कांग्रेसी उम्मीदवार 40 हजार 724 वोट मिले जो श्री फातमी की हार कारण बना। बहरहाल, इस बार का चुनाव भी कमोबेश इसी ढर्रे पर लड़ा जा रहा है। विकास के तमाम दावे और विकास के नाम पर राजनीति खोखली बातें साबित हुई हैं। इसका प्रमाण यह है कि राजनीति पर सामाजिक समीकरण हावी है। अंतर केवल इतना है कि जदयू के उम्मीदवार के कारण ब्राह्म्ण वोटों में बिखराव संभव होगा। वैसे देखना दिलचस्प होगा कि इस बार भी दरभंगा की जनता पुरानी लड़ाई को बदस्तूर जारी रखती है या नहीं।

गरीब बिहार के अमीर उम्मीदवार

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
दोस्तों, बिहार गरीब राज्य है। राज्य के सभी तमाम बड़े नेता बिहार के गरीब होने की दुहाई देते हैं। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि इसी गरीब राज्य के ये नेता किसी भी मायने में गरीब नहीं हैं। अधिसंख्य के पास करोड़ों-अरबों की संपत्ति है। मसलन नवादा से भाजपा के प्रत्याशी गिरिराज सिंह के पास चल संपत्ति के रुप में 70 लाख रुपए हैं। वहीं अचल संपत्ति को जोड़ दें तो श्री सिंह कागजी रुप में भी करोड़पति ही हैं। नामांकन पर्चे के साथ दिये गये संपत्ति के उल्लेख में श्री सिंह ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि उनके पास भले ही सोने की केवल एक अंगुठी हो, लेकिन उनकी पत्नी के पास 60 ग्राम सोना और 200 ग्राम चांदी है।
वहीं सासाराम से चुनाव लड़ रहीं निवर्तमान लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के पास अपनी कोई गाड़ी नहीं है। इनकी गरीबी का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि इनके पास 36 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति है। यही हाल जमुई से लोकसभा चुनाव लड़ रहे लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान का भी है। उनके पास भी अपना कोई वाहन नहीं है लेकिन संपत्ति करोड़ों में है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक यह है कि चिराग के उपर राजधानी पटना के राजाबाजार स्थित पीएनबी शाखा का करीब 45 लाख रुपए कर्ज है। काराकट से राजद प्रत्याशी कांति सिंह को गहनों से खूब लगाव है। उनके पास 250 ग्राम सोना और 580 ग्राम चांदी है। इनके पति को भी सोने चांदी रखने का बहुत शौक है। पुरुष होने के बावजूद इनके पास 140 ग्राम सोना और 600 ग्राम चांदी है। अन्य चल और अचल संपत्ति की कीमत करोड़ों में है।
बहरहाल, स्वच्छ राजनीति का दावा करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दल जदयू की टिकट पर नवादा से चुनाव लड़ रहे कौशल यादव सचमुच बाहुबली हैं। इनके उपर 8 मामले लंबित हैं। नवादा व्यवहार न्यायालय में प्रक्रियाधीन ये मामले जालसाजी, धोखाधड़ी एवं अन्य संज्ञेय अपराधों से संबंधित हैं। बाहुबली होने के साथ-साथ कौशल यादव 15 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति है। इसमें इनकी पत्नी पूर्णिमा यादव की संपत्ति भी शामिल है। सबसे खास बात यह है कि श्री यादव अत्याधुनिक शस्त्र रखने के शौकीन हैं और इससे भी दिलचस्प यह है कि पिछले पांच वर्षों में इनकी संपत्ति में दिन दुनी रात चौगुणी वृद्धि हुई है।

Kaushlendra Jha Minapur

Kaushlendra Jha Minapur

मुजफ्फरपुर : समाजवाद की धरती पर समाजवादियों को चुनौती

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
मुजफ्फरपुर की धरती केवल लीची के लिए ही मशहूर नहीं है। समाजवाद के लिए भी यह सबसे ऊर्वर व उपजाऊ है। प्रमाण यह है कि वर्ष 1977 के बाद यहां हुए दस लोकसभा चुनावों में गैर समाजवादियों को केवल एक बार जीत मिली। वह भी वर्ष 1984 में जब पूरे देश में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ रही थी। मौजूदा दौर में कभी समाजवादियों की धरती रही मुजफ्फरपुर में जातिवाद राजनीतिक समीकरण का मुख्य अव्यव है।
साठ के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने मुसहरी प्रखंड में भूमि सुधार के जरिए समाज को नयी चेतना देने का प्रयास किया। इसके पहले विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी मुजफ्फरपुर में सबसे अधिक सफल हुआ। वर्ष 1977 का चुनाव पूरे देश में परिवर्तन लेकर आया। गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल पूरे फार्म में नजर आये। मुजफ्फरपुर में भी बाहरी होने के बावजूद जार्ज फर्नांडीस बतौर लोकदल प्रत्याशी विजयी रहे। उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार नीतीश्वर प्रसाद सिंह को हराया। इस चुनाव में श्री फर्नांडीस को 78.23 फीसदी और श्री सिंह को 12.32 फीसदी वोट मिले। वर्ष 1980 का चुनाव वर्ष 1977 के चुनाव के ठीक विपरीत था। पूरे देश में ‘आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को लायेंगे’ का नारा असर दिखा रहा था। लेकिन मुजफ्फरपुर की जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ। श्री फर्नांडीस एक बार फिर विजयी रहे। हालत यह रही कि कांग्रेस यहां मुख्य मुकाबले से बाहर थी। दूसरे नंबर पर जनता पार्टी के दिग्विजय नारायण सिंह रहे। हालांकि वर्ष 1984 में कांग्रेस फिर से अस्तित्व में लौटी और ललितेश्वर प्रसाद शाही जीतने में कामयाब हुए। उन्होंने कैप्टन जयनारायण निषाद को हराया था जो उस समय लोकदल के प्रत्याशी थे। इसके बाद मुजफ्फरपुर के राजनीतिक फलक से कांग्रेस पूरी तरह गायब हो गयी। वर्ष 1989 के चुनाव में जार्ज फर्नांडीस फिर वापस लौटे और बतौर जनता दल उम्मीदवार लगातार दो बार चुनाव जीतने में कामयाब रहे। वर्ष 1991 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के रघुनाथ पांडे को हराया।
वहीं वर्ष 1996 में लालू प्रसाद ने बतौर जनता दल उम्मीदवार कैप्टन जयनारायण निषाद को मैदान में उतारा। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि जार्ज फर्नांडीस तब नीतीश कुमार के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन कर चुके थे। इस चुनाव में कैप्टन निषाद ने समता पार्टी के उम्मीदवार हरेंद्र कुमार को लगभग 13 फीसदी मतों के अंतर से पराजित किया। वर्ष 1998 के चुनाव में भी लालू प्रसाद ने कैप्टन जयनारायण निषाद में विश्वास व्यक्त किया और मुजफ्फरपुर की जनता ने भी। वहीं वर्ष 1999 में कैप्टन निषाद ने राजद छोड़ जदयू की सदस्यता ले ली। नये दल के प्रत्याशी के रूप में भी वे लगातार तीसरी बार जितने में कामयाब रहे। उन्होंने राजद के महेंद्र साहनी को हराया। इस जीत के बाद उन्हें केंद्र की एनडीए सरकार में मंत्री बनने का सौभाग्य भी मिला। लेकिन वर्ष 2004 में जार्ज फर्नांडीस ने पिछले दरवाजे के बजाय मुख्य द्वार से संसद पहुंचने की इच्छा व्यक्त की तब जदयू ने उन्हें मुजफ्फरपुर से अपना उम्मीदवार बनाया। राजद के भगवान लाल साहनी ने उन्हें जबरदस्त टक्कर दी। इस चुनाव में श्री फर्नांडीस को 47.2 फीसदी वोट और श्री साहनी को 45.97 फीसदी वोट मिले। वहीं वर्ष 2009 के चुनाव में जदयू ने जार्ज फर्नांडीस से किनारा कर लिया और टिकट के हकदार एक बार फिर कैप्टन निषाद बने। नीतीश कुमार के प्रभाव के कारण इन्हें जीत भी मिल गयी। इस चुनाव में उन्हें 1 लाख 95 हजार 91 वोट मिले वहीं राजद-लोजपा गठबंधन के उम्मीदवार भगवान लाल साहनी को 1 लाख 47 हजार 282 वोट मिले।
बहरहाल, इस बार चुनावी समीकरण में उलट-पुलट हो चुका है। कैप्टन निषाद ने जदयू से विद्रोह कर भाजपा का दामन थाम लिया और भाजपा ने भी उनके पुत्र अजय निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया है। जबकि राजद-कांग्रेस गठबंधन ने अखिलेश प्रसाद सिंह को मैदान में उतार कर एक बार फिर भूमिहार समाज के मतदाताओं को साधने का प्रयास किया है। वहीं जदयू द्वारा विजेंद्र चौधरी को टिकट देने का मन बनाया है। उसके निशाने पर बड़ी संख्या में अति पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं। हालांकि श्री चौधरी के नाम पर जदयू में फूट मची है। बदली परिस्थितियों में जाति का खेल सिर चढ़कर बोल रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार समाजवादियों की धरती के लोग क्या फैसला सुनाते हैं।