Monday, November 17, 2014

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा

कौशलेंद्र झा
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में यह कथन था कि संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते; मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं। इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार की।
इस घोषणा से राष्ट्रों को प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और वे इन अधिकारों को अपने संविधान या अधिनियमों के द्वारा मान्यता देने और क्रियान्वित करने के लिए अग्रसर हुए। राज्यों ने उन्हें अपनी विधि में प्रवर्तनीय अधिकार का दर्जा दिया।
10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की समान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया।
अनुच्छेद 1
सभी मनुष्यों को गौरव और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है। उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा की देन प्राप्त है और परस्पर उन्हें भाईचारे के भाव से बर्ताव करना चाहिए।
अनुच्छेद 2
सभी को इस घोषणा में सन्निहित सभी अधिकरों और आजादियों को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई फ़रक न रखा जाएगा।
अनुच्छेद 3
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है।
अनुच्छेद 4
कोई भी गुलामी या दासता की हालत में न रखा जाएगा, गुलामी-प्रथा और गुलामों का व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्ध होगा।
अनुच्छेद 5
किसी को भी शारीरिक यातना न दी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यबहार होगा।
अनुच्छेद 6
हर किसी को हर जगह कानून की निगाह में व्यक्ति के रूप में स्वीकृति-प्राप्ति का अधिकार है।
अनुच्छेद 7
कानून की निगाह में सभी समान हैं और सभी बिना भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा के अधिकारी हैं। यदि इस घोषणा का अतिक्रमण करके कोई भी भेदभाव किया जाए या उस प्रकार के भेदभाव को किसी प्रकार से उकसाया जाए, तो उसके विरुद्ध समान सुरक्षण का अधिकार सभी को प्राप्त है।
अनुच्छेद 8
सभी को संविधान या कानून द्वारा प्राप्त बुनियादी अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले कार्यों के विरुद्ध समुचित राष्ट्रीय अदालतों की कारगर सहायता पाने का हक है।
अनुच्छेद 9
किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार, नजरबंद, या देश-निष्कसित न किया जाएगा।
अनुच्छेद 10
सभी को पूर्ण्तः समान रूप से हक है कि उनके अधिकारों और कर्तव्यों के निश्चय करने के मामले में और उन पर आरोपित फौजदारी के किसी मामले में उनकी सुनवाई न्यायोचित और सार्वजनिक रूप से निरपेक्ष एवं निष्पक्ष अदालत द्वारा हो।
अनुच्छेद 11
1. प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दंडनीय अपरोध का आरोप किया गया हो, तब तक निरपराध माना जाएगा, जब तक उसे ऐसी खुली अदालत में, जहां उसे अपनी सफाई की सभी आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों, कानून के अनुसार अपराधी न सिद्ध कर दिया जाए।
2. कोई भी व्यक्ति किसी भी ऐसे कृत या अकृत (अपराध) के कारण उस दंडनीय अपराध का अपराधी न माना जाएगा, जिसे तत्कालीन प्रचलित राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार दंडनीय अपराध न माना जाए और न अससे अधिक भारी दंड दिया जा सकेगा, जो उस समय दिया जाता जिस समय वह दंडनीय अपराध किया गया था।
अनुच्छेद 12
किसी व्यक्ति की एकांतता, परिवार, घर, या पत्रव्यवहार के प्रति कोई मनमाना हस्तक्षेप न किया जाएगा, न किसी के सम्मान और ख्याति पर कोई आक्षेप हो सकेगा। ऐसे हस्तक्षेप या आक्षेपों के विरुद्ध प्रत्येक को कनूनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक देश की सीमाओं के अंदर स्वतंत्रतापूर्वक आने, जाने और बसने का अधिकार है।
2. प्रत्येक व्यक्ति को अपने या पराए किसी भी देश को छोड़ने और अपने देश वापस आने का अधिकार है।
अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्ताए जाने पर दूसरे देशों में शरण लेने और रहने का अधिकार है।
2. इस अधिकार का लाभ ऐसे मामलों में नहीं मिलेगा जो वास्तव में गैर-राजनीतिक अपराधों से संबंधित हैं, या जो संयुक्त राष्ट्रों के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य हैं।
अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी राष्ट्र-विशेष को नागरिकता का अधिकार है।
2. किसी को भी मनमाने ढंग से अपने राष्ट्र की नागरिकता से वंचित न किया जाएगा या नागरिकता का परिवर्तन करने से मना न किया जाएगा।
अनुच्छेद 16
1. बालिग स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या दर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार स्थापन करने का अधिकार है। उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन में, तथा विवाह विच्छेद के बारे में समान अधिकार है।
2. विवाह का इरादा रखने वाले स्त्री-पुरुषों की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर ही विवाह हो सकेगा।
3. परिवार समाज का स्वाभाविक और बुनियादी सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षण पाने का अधिकार है।
अनुच्छेद 17
1. प्रत्येक व्यक्ति को अकेले और दूसरों के साथ मिलकर संपत्ति रखने का अधिकार है। 2. किसी को भी मनमाने ढंग से अपनी संपत्ति से वंचित न किया जाएगा।
अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंतरात्मा और धर्म की आजादी का अधिकार है। इस अधिकार के अंतर्गत अपना धर्म या विश्वास बदलने और अकेले या दूसरों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप में अथवा निजी तर पर अपने धर्म या विश्वास को शिक्षा, क्रिया, उपसाना, तथा व्यवहार के द्वारा प्रकट करने की स्वतंत्रता है।
अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्ति को विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिए से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण, ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित है।
अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्ति को शांति पूर्ण सभा करने या समित्ति बनाने की स्वतंत्रता का अधिकार है।
2. किसी को भी किसी संस्था का सदस्य बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधिओं के जरिए हिस्सा लेन का अधिकार है।
2. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकारी नौकरियों को प्राप्त करने का समान अधिकार है।
३. सरकार की सत्ता का आधार जनता की इच्छा होगी। इस इच्छा का प्रकटन समय-समय पर और असली चुनावों द्वारा होगा। ये चुनावों सार्वभौम और समान मताधिकार द्वारा होंगे और गुप्त मतदान द्वारा या किसी अन्य समान स्वतंत्र मतदान पद्धति से कराए जाएंगे।
अनुच्छेद 22
समाज के एक सदस्य के रूप में प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के उस स्वतंत्र विकास तथा गौरव के लिए - जो राष्ट्रीय प्रयत्न या अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा प्रत्येक राज्य के संगठन एवं साधनों के अनुकूल हो - अनिवार्यतः आवश्यक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की प्राप्ति का हक है।
अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्ति को काम करने, इच्छानुसार रोजगार के चुनाव, काम की उचित और सुविधाजनक परिस्थितियों को प्राप्त करने और बेकारी से संरक्षण पाने का हक है।
2. प्रत्येक व्यक्ति को समान कार्य के लिएअ बिना किसी भेदभव के समान मजदूरी पाने का अधिकार है।
3. प्रत्येक व्यक्ति को जो काम करता है, अधिकार है कि वह इतनी उचित और अनुकूल लजदूरी पाए, जिससे वह अपने लिए और अपने परिवार के लिए ऐसी आजीविका का प्रबंध कर सके, जो मानवीय गौरव के योग्य हो तथा आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति अन्य प्रकार के सामाजिक संरक्षणों द्वारा हो सके।
4. प्रत्येक व्यक्ति को अपने हितों की रक्षा के लिए श्रमजीवी संघ बनाने और उनमें भाग लेने का अधिकार है।
अनुच्छेद 24
प्रत्येक ब्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है। इसके अंतर्गत काम के घंटों की उचित हदबंदी और समय-समय पर मजदूरी सहित छुट्टियां सम्मिलित है।
अनुच्छेद 25
1.प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए पर्याप्त हो। इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएं और आवश्यक सामाजिक सेवाएं सम्मिलित है। सभी को बेकारी, बीमारी, असमर्था, वैधव्य, बुढ़ापे या अन्य किसी ऐसी परिस्थिति में आजीविका का साधन न होने पर जो उसके काबू के बाहर हो, सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।
2. जच्चा और बच्चा को खास सहायता और सुविधा का हक है। प्रत्येक बच्चे को चाहे वह विवाहिता माता से जन्मा हो या अविवाहिता से, समान सामाजिक संरक्षण प्राप्त है।
अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है। शिक्षा कम से कम प्रारंभिक और बुनियादी अवस्थाओं में निःशुल्क होगी। प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी। टेक्निकल, यांत्रिक और पेशों-संबंधी शिक्षा साधारण रूप से प्राप्त होगी और उच्चतर शिक्षा सभी को योग्यता के आधार पर समान रूप से उपलब्ध होगी।
2. शिक्षा का उद्देश्य होगा मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की पुष्टि। शिक्षा द्वारा राष्ट्रों, जातियों, अथवा धार्मिक समूहों के बीच आपसी सद्भावना, सहिष्णुता और मैत्री का विकास होगा और शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्रों के प्रयत्नों को आगे बढ़ाया जाएगा।
3. माता-पिता को सबसे पहले इस बात का अधिकार है कि वह चुनाव कर सकें कि किस किस्म की शिक्षा उनके बच्चों को दी जाएगी।
अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता-पूर्वक समाज के सांस्कृतिक जीवन में हिस्सा लेने, कलाओं का आनंद लेने, तथा वैज्ञानिक उन्नति और उसकी सुविशाओं में भाग लेने का हक है।
2. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी ऐसी वैज्ञानिक साहित्यिक या कलात्मक कृति से उत्पन्न नैतिक और आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार है जिसका रचयिता वह स्वयं है।
अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की प्राप्ति का अधिकार है जिसमें उस घोष्णा में उल्लिखित अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पूर्णतः प्राप्त किया जा सके।
अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति का उसी समाज प्रति कर्तव्य है जिसमें रहकर उसके व्यक्तित्व का स्वतंत्र और पूर्ण विकास संभव हो।
2. अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग करते हुए प्रत्येक व्यक्ति केवल ऐसी ही सीमाओं द्वारा बंध होगा, जो कानून द्वारा निश्चित की जाएंगी और जिनका एकमात्र उद्देश्य दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के लिए आदर और समुचित स्वीकृति की प्राप्ति होगा तथा जिनकी आवश्यकता एक प्रजातंत्रात्मक समाज में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और समान्य कल्याण की उचित आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।
3. इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग किसी प्रकार से भी संयुक्त राष्ट्रों के सिद्धांतों और उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 30
इस घोष्णा में उल्लिखित किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए जिससे य प्रतीत हो कि किसी भी राज्य, समूह या ब्यक्ति को किसी ऐसे प्रयत्न में संलग्न होने या ऐसा कार्य करने का अधिकार है, जिसका उद्देश्य यहां बताए गए अधिकारों और स्वतंत्रताओं में से किसी का भी विनाश करना हो।

Tuesday, October 7, 2014

मानवाधिकार की रक्षा करने का दंभ भरना प्रचलन सा हो गया है

कौशलेंद्र झा
सरकारों के लिए मानवाधिकार की रक्षा करने का दंभ भरना प्रचलन सा हो गया है। किंतु, वास्तव में मानवीय मुल्यों के प्रति सरकारें कितनी गंभीर है? यह बड़ा सवाल है। सच तो ये हैं कि मनुष्य के जीवन के सार्वभौमिक हक की रक्षा करने में भी हमारी सरकारें नाकामयाब साबित हो रही है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रति वर्ष 33,908 लोगों की हत्या, मानवाधिकार की सुरक्षा का दंभ भरने वाले देश के लिए एक गंभीर चुनौती नही, तो और क्या है?
मौत की आंकड़ों पर नजर डालें तो हमारा बिहार दुसरे ही पादान पड़ खड़ा मिलेगा। यहां प्रति वर्ष औसत 3,362 लोग मारे जातें हैं। जबकि, राष्ट्रीय स्तर पर अव्वल उत्तर प्रदेश सर्वाधिक मौत का गवाह बन चुका है। यहां प्रति वर्ष औसत 4,456 लोगों को विभिन्न वारदातों में अपनी जान गवांनी पड़ रही है। बिहार के बाद महाराष्ट्र में 2,837, आंध्रप्रदेश में 2,538 और मध्यप्रदेश में 2,441 लोगो की प्रति वर्ष हत्या होने के बावजूद हमारी सरकारें किस मुंह से मानवाधिकार संरक्षण की बातें करती है?

Tuesday, September 30, 2014

चिमनी का ट्रैक्टर फूंका, मुंशी को बांधकर पीटा

लेवी नहीं देने से खफा नक्सलियों ने नरमा में चिमनी पर बोला धावा
दहशत फैलाने के लिए छह राउंड की हवाई फायरिंग
जाते-जाते छोड़ गये तीन हस्तलिखित पर्चे
इलाके के सभी चिमनी मालिकों को धमकाया
मीनापुर। हिन्दुस्तान संवाददाता
पड़ोसी हथौड़ी थाना क्षेत्र के नरमा गांव में स्थित मां वैष्णो ब्रिक्स चिमनी पर सोमवार की देर रात एक दर्जन सशस्त्र नक्सलियों ने हमला किया। चिमनी के ट्रैक्टर में आग लगाने के बाद नक्सलियों ने छह राउंड हवाई फायरिंग भी की। फिर माओवाद जिंदाबाद... के नारे लगाते हुए लौट गये। जाते-जाते घटनास्थल पर तीन हस्तलिखित पर्चे भी छोड़ गये। नक्सलियों ने चिमनी मालिक रामबाबू राय से लेवी में पांच लाख रुपये की मांग की थी।
उत्तर बिहार पश्चिम जोनल कमेटी के नाम से जारी पर्चे सभी चिमनी मालिकों को संबोधित है जिसमें नक्सलियों की ओर से चेतावनी दी गई है कि निर्धारित समय सीमा में लेवी नहीं देने पर सबकों यही अंजाम भुगतना होगा है।
घटना सोमवार की रात करीब दो बजे की है। करीब एक दर्जन सशस्त्र नक्सलियों ने मां वैष्णो चिमनी पर धावा बोलकर सबसे पहले मुंशी अंजनी सिंह को बंधक बना लिया और उनकी पिटाई करने के बाद आंखों पर पट्टी बांध दी। उसके बाद पेट्रोल छिड़क कर ट्रैक्टर को आग के हवाले कर दिया। कुछ देर ठहरने के बाद सभी नक्सली पूरब दिशा की ओर निकल गये। मंगलवार की सुबह पहुंची हथौड़ी पुलिस ने घटनास्थल से तीनों पर्चे बरामद किया। अज्ञात नक्सलियों पर एफआईआर दर्ज की गई है।
बढाते गये लेवी की राशि :
मीनापुर थाना क्षेत्र के मुकसूदपुर गांव निवासी मां वैष्णो ब्रिक्स चिमनी के मालिक रामबाबू राय पिछले तीन महीने से नक्सलियों के निशाने पर हैं। नक्सली लगातार उनसे लेवी की मांग कर रहे थे। श्री राय ने इस बाबत मीनापुर थाने में अज्ञात नक्सलियों पर एफआईआर दर्ज करायी थी। मंगलवार को श्री राय ने बताया कि अज्ञात मोबाइल नम्बर से फोन करके खुद को नक्सली बताकर तीन माह पहले 45 हजार रुपये लेवी देने को कहा गया। एक महीने के बाद दो लाख रुपये की मांग करने लगे। हाल के दिनो में फोन करने वाला पांच लाख रुपये लेवी मांग रहा था। इस क्षेत्र के अधिकांश चिमनी मालिकों को पत्र लिख कर नक्सली लेवी की मांग कर चुके हैं।

Friday, September 26, 2014

हाई अलर्ट पर हैं भतिजे

मीनापुर। कौशलेंद्र झा
कई रोज बाद आज घुरहू काका मिलें। काका जल्दी में थे। दुर्गा पूजा के लिए चंदा वसूली करनी है। उनके चार भतीजे पहले से झंडा और डंडा लेकर सड़क पर मोर्चा सम्भाल चुकें हैं। प्रसाद खाने के नाम पर राहगीरो को रोकना और आस्था के नाम पर चंदा वसूली करना, इनकी दिनचर्या बन चुका है। बात सिर्फ दुर्गा पूजा की नही है। सरस्वती पूजा और विश्वकर्मा पूजा के अतिरिक्त महावीरी झंडा में भी चंदा वसूली का ठेका अपने काका को ही मिलता है। काका कहतें हैं कि बेरोजगारी के दिनों में हनुमानजी बड़े काम आतें हैं।
काका कहतें हैं कि वैसे तो हमारे समाज में आस्थावान लोगो की कोई कमी नही है। फिर भी कुछ लोग डंडा पटके बिना चंदा नही निकालते हैं। दिन में दो चार बार लप्पर थप्पर से निपटने के लिए भतिजों को हाई अलर्ट पर रखा हुआ है। सड़क पर निकल कर तो देखिए। हर चौथे, पांचवें किलो मिटर पर ऐसे भतिजों की फौज दीख जायेगी। पुलिस के पास जाने से कुछ नही होगा। यहा सभी मैनेज है भाई। दरअसल मीडिया वाला अटर पटर छाप के खेल बिगाड़ देता है।
काका खुद को बड़ा समाज सेवक होने का दावा करते हुए कहतें हैं कि हमलोग पुरा दिन डिउटी करतें हैं। धंधे में बहुत मेहनत करनी परती है। ऐसे में चंदा के पैसे से कचरी चूड़ा खा लिया, तो इसमें बुराई क्या है? शाम में लड़के लोग दो चार पैग नही लेंगे तो अगली सुवह काम कौन करेगा? आप लोगो से अच्छा तो अपना मुख्यमंत्री है। आपने धर्म ग्रथं नही पढ़ा? हमारे तो देवता भी चढ़ावे से खुश होकर सोमपान करतें थे। काका बिना रुके बोल रहे थे। कहने लगे कि नाच नही होगा तो दुर्गाजी को देखने आएगा कौन? नेपाल से डेढ़ लाख रुपये में नाच आ रहा है। पंडाल वाला को दो लाख रुपये देना है। बिजली और डेकोरेशन वाला लेगा, सो अलग। सारा खर्चा तो पूजे पर जायेगा न...।
बेटी का विवाह होता तो जमीन बिक जाता। आप तो जानतें ही है, गत सप्ताह गांव की लुखिया, बीमारी से तड़प तड़प कर दवा के अभाव में दम तोड़ गयी। किसी ने एक रुपये भी मदद किया क्या? मुसमात को रहने के लिए घर नही है। गांव की सड़क पर गड्ढ़़ा हो गया है। इसके लिए चंदा कौन देगा? चंदा लेना है तो नाच करना होगा। इसमें यदि आस्था जुड़ा हो तो चार, पांच लाख रुपये की वसूली कर लेना कोई बड़ी बात नही होती। जी, चौकिए नही। यें हमारी आस्था है। इसके खिलाफ एक शब्द भी निकला तो आपकी खैर नही...।

Saturday, September 20, 2014

एक्सक्ल्यूसिव है भाई

मीनापुर। कौशलेंद्र झा
एक बूढ़ा सड़क किनारें कुआं में गिर कर चिल्ला रहा था। सड़क से जा रहें एक शिक्षक की उस पर नजर पड़ी। बूढ़ा चिल्लाया, बचाव ़ ़ ़। शिक्षक बोले भाई, आज मेरे विद्यालय में जांच होने वाली है। तुमको बचाने में बिलम्ब हुआ तो मैं खुद फस जाउंगा। यह कहतें हुए शिक्षक वहां से चले गये। थोड़ी देर बाद एक पंडितजी उसी राह से गुजर रहे थे। बूढ़े ने आबाज लगाई, बचाव ़ ़ ़। पंडितजी ने झांक कर देखा और कहने लगे भाई, मैं जानता हूं तुम बहुत कष्ट में हो। मैं तुम्हारे लिए ईश्वर से प्रार्थना करुंगा। किंतु, इस वक्त मैं बहुत जल्दी में हूं। मेरे यजमान का मुहूर्त निकला जा रहा है। कुछ देर बाद एक मौलबी साहब आए। बूढे ने फिर गुहार लगाई, बचाव ़ ़ ़। मौलबी साहब बोले भाई, मेरे नमाज का वक्त हो चुका है। अल्लाह तेरी मदद जरुर करेगा। वह बूढ़ा अब हताश हो चुका था। वह अपना सिर पिटने लगा। कु आं से बाहर आने क ा कोई उपाए सूझ नही रहा था। अचानक उसने देखा कि सड़क से पुलिस के एक अधिकारी जा रहें हैं। बूढ़े ने फिर आबाज लगाई, बचाव ़ ़ ़ बचाव ़ ़ ़। पुलिस अधिकारी रुक कर कु आं में झांके और कहने लगे ़ ़ ़ भाई, मैंने पहले भी कई लोगो को कुआं से बाहर निकाला है। पर, तुम्हें नही निकाल सकता हूं। क्योंकि, यह मेरा एरिया नही है। बूढ़े के कुआं में होने की खबर मिलते ही घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने का दावा करने वाले पत्रकारजी कुआं पर पहुंच गये। खबर पर नजर पड़ी तो बाईलाईन स्टोरी का ख्वाब स्वभाविक था। सोचने लगे कि आज मेन पेज जरुर मिल जायेगा। इस उम्मीद में पत्रकारजी ने बूढ़े से सवाल पूछा ़ ़ ़भाई, इस कुआं में तुम कैसा महसूस कर रहें हो? सरकार और प्रशासन के बारे में क्या कहना? कुआं से निकल कर आंदोलन के लिए कौन सी पार्टी ज्वाईन करोगे? बूढ़ा हताश होकर रोने लगा। बूढे को रोता हुआ देख पत्रकारजी कैमरा निकाले और कहने लगे पहले अपना दोनो हाथ सिर पर रखो तब रोना। एक्सक्ल्यूसिव फोटो बनेगा। कल के अखबार का मेन पेज देख लेना। अखबार में खबर छपते ही नेताजी कुंआ का मुआईना करने पहुंच गए। देखते ही देखते भीड़ इकट्ठा हो गई। नेताजी ने बूढ़ा के कुआं में गिरने की जांच सीबीआई से कराने की मांग करते हुए कहा कि बूढ़े के परिजन को तत्काल दस लाख रुपये का मुआवजा मिले और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिया जाये। नेताजी ने आगे कहा कि जब तक उनकी सभी मांगे पुरी नही होती, तब तक इसी कुआं के समीप धरना जारी रहेगा।

Friday, September 19, 2014

फूल और मिठाई से खुश नहीं होंगे विश्वकर्मा भगवान

मीनापुर। कौशलेंद्र झा
आज देव शिल्पी विश्वकर्मा का जन्मदिन है। इनके जन्मदिन को देश भर में विश्वकर्मा जयंती अथवा विश्वकर्मा पूजा के नाम से मनाया जाता है। देवशिल्पी विश्वकर्मा ही देवताओं के लिए महल, अस्त्र-शस्त्र, आभूषण आदि बनाने का काम करते हैं। इसलिए यह देवताओं के भी आदरणीय हैं।
इन्द्र के सबसे शक्तिशाली अस्त्र वज्र का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि की रचना में ब्रह्मा की सहायता की और संसार की रूप रेखा का नक्शा तैयार किया। मान्यता है कि विश्वकर्मा ने उड़ीसा में स्थित भगवान जगन्नाथ सहित, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्ति का निर्माण भी विश्वकर्मा के हाथाों ही हुआ माना जाता है।
रामायण में वर्णन मिलता है कि रावण की लंका सोने की बनी थी। ऐसी कथा है कि भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के बाद विश्वकर्मा से सोने की लंका का निर्माण करवाया था। शिव जी ने रावण को पंडित के तौर पर गृह पूजन के लिए बुलवाया।
पूजा के पश्चात रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में सोने की लंका ही मांग ली। सोने की लंका को जब हनुमान जी ने सीता की खोज के दौरान जला दिया तब रावण ने पुनः विश्वकर्मा को बुलवाकर उनसे सोने की लंका का पुनर्निमाण करवाया।
देव शिल्पी होने के कारण भगवान विश्वकर्मा मशीनरी एवं शिल्प उद्योग से जुड़े लोगों के लिए प्रमुख देवता हैं। वर्तमान में हर व्यक्ति सुबह से शाम तक किसी न किसी मशीनरी का इस्तेमाल जरूर करता है जैसे कंप्यूटर, मोटर साईकल, कार, पानी का मोटर, बिजली के उपकरण आदि। भगवान विश्वकर्मा इन सभी के देवता माने जाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा की पूजा करने से मशनरी लंबे समय तक साथ निभाती हैं एवं जरूरत के समय धोखा नहीं देती है। विश्वकर्मा की पूजा का एक अच्छा तरीका यह है कि आप जिन मशीनरी का उपयोग करते हैं उनकी आज साफ-सफाई करें।
उनकी देखरेख में जो भी कमी है उसे जांच करके उसे दुरूस्त कराएं और खुद से वादा करें कि आप अपनी मशीनरी का पूरा ध्यान रखेंगे। विश्वकर्मा की पूजा का यह मतलब नहीं है कि आप उनकी तस्वीर पर फूल और माला लटकाकर निश्चिंत हो जाएं।

बात भी की, 'बांह' भी मरोड़ता रहा चीन

 मीनापुर। कौशलेंद्र झा
नई दिल्ली। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का भारत दौरा भारत-चीन संबंधों को कहां तक ले गया है, ये सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि एक तरफ भारत चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा था, दूसरी तरफ चीनी सैनिक लद्दाख के चुमार में घुसपैठ कर रहे थे। ऐसे में फिर वही सवाल मौजूद रहा कि चीन आखिर चाहता क्या है? क्या उसे सीमा विवाद सुलझाने की कोई परवाह नहीं?
शी चिनफिंग भारत का दौरा करने वाले तीसरे चीनी राष्ट्रपति हैं। सवाल ये उठता है कि क्या चीनी सैनिकों की घुसपैठ सोची समझी रणनीति थी। क्या इसे कुछ दिन टाला नहीं जा सकता था।
बहरहाल, दूसरे दिन दिल्ली में मोदी-चिनफिंग की बातचीत हुई 12 मुद्दों पर व्यापारिक समझौते हुए। इसका फायदा दोनों देशों को मिलेगा। लेकिन क्या व्यापारिक संबंधों की खातिर भारत चीनी सैनिकों की हरकतों की नजरअंदाज करता रहेगा। हमेशा की तरह इस बार भी चीन ने घुसपैठ पर गोलमोल जवाब ही दिया। एक तरह मोदी कहते रहे कि सीमा विवाद सुलझाना ही होगा, दूसरी तरफ चिनफिंग ने इसका समाधान निकालने की बात कही।
दरअसल, चीन एक ऐसा देश है जिसे साध पाना बेहद मुश्किल है। अगर आपका पड़ोसी चीन जैसा शक्तिशाली और विस्तारवादी देश है, तो उससे द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत पड़ती है।
भारत-जापान की नजदीकियों को चीन खास पसंद नहीं करता है। जापान के साथ भी चीन का जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। साथ ही अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी की कोशिशें भी चीन से छुपी हुई नहीं है। उधर, वियतनाम के साथ भी भारत के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वियतनाम दौरा करके आए हैं। गौर करने लायक बात है कि वियतनाम के साथ भी चीन का सीमा विवाद चल रहा है।
इन तथ्यों के मद्देनजर शी चिनफिंग के दौरे के समय चीनी सैनिकों की घुसपैठ को क्या समझा जाए? क्या ये चीन की सोची समझी रणनीति है? क्या चीन भारत को संदेश देना चाहता है कि सीमा विवाद सिर्फ चीन ही सुलझा सकता है ? अमेरिका-जापान जैसे देश इसमें कुछ नहीं कर सकते। भारत को इसके लिए चीन से ही बात करनी होगी। अगर चीन अपने राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान घुसपैठ को अंजाम दे सकता है, तो सोचा जा सकता है कि वो सीमा विवाद पर अपनी मनमानी को लेकर कितना दुस्साहसी हो सकता है।
बहरहाल, तमाम सवालों के बीच भारत और चीन के बीच इस वार्ता के दौरान कुल बारह समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें कैलाश मानसरोवर के लिए नया रूट खोलने, रेलवे को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं। जबकि सीमा विवाद पर मोदी ने इसे सुलझाने की बात कही तो चीन इस पर बातचीत आगे बढ़ाने की पुरानी रट लगाए रहा। यानि चीन भारत आकर भी बिना ठोस जवाब दिए निकल गया। मोदी ने चीन से दोटूक कह दिया कि अब वक्त आ गया है जब हम सरहद की एक पक्की लकीर खींचें। लाइन ऑफ कंट्रोल यानि LAC सिर्फ काल्पनिक रेखा न रहे। ताकि हर दूसरे दिन घुसपैठ न हो।
संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में मोदी ने कहा, मैंने सुझाव दिया है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के लिए एलएसी को स्पष्ट करना बेहद जरूरी है। ये काम कई सालों से रुका हुआ है और इसकी दोबारा शुरूआत होनी चाहिए।
वहीं चिनफिंग ने कहा, भारत-चीन के सरहद विवाद ऐतिहासिक विवाद है। पिछले कई सालों से ये मुद्दा चर्चा में है। सरहद को डीमार्केट करने की जरूरत है। कई बार वहां मुद्दे उठते हैं। दोनों देश ऐसी घटनाओं का रिश्तों पर असर रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। सरहद विवाद सुलझाने के लिए दोस्ताना पहल करेंगे।
जैसे मोदी के कड़े शब्दों में चीन के राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान अरुणाचल प्रदेश में चीन की घुसपैठ से उपजी हैरत और नाराजगी का पुट था। वैसे भारत ने कई और मुद्दों पर चीन से अपना ऐतराज दर्ज करवाया। इसमें सीमा विवाद के अलावा, अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को दिए जाने वाले चीन के नत्थी वीजा (स्टेपल वीजा) का मुद्दा भी शामिल था। चीन चूंकि अरुणाचल के एक बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जताता है इसीलिए उसके लोगों को नत्थी वीजा जारी करता है, जो खासा अपमानजनक है। इतना ही नहीं मोदी ने चीन से भारत आने वाली नदियों के पानी को लेकर चल रहे विवाद भी चिनफिंग से बातचीत में उठाए। इशारा भारत में हर साल बाढ़ से तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की ओर था।
इतना ही नहीं जापान की तरह चीन ने भी अपनी बुलेट ट्रेन भारत की ओर दौड़ा दी है। बुलेट ट्रेन नाम जापान से जुड़ा है, लिहाजा चीन इसे हाई स्पीड रेल का नाम देता है। चीन की मदद से भारत में चेन्नई से मैसूर वाया बेंगलुरू ये हाई स्पीड ट्रेन चलेगी। भारत में निवेश के लिए अपना खजाना भी खोल दिया। चीन भारत में अगले पांच सालों में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
चीन महाराष्ट्र और गुजरात में दो इंडस्ट्रियल पार्क बनाने पर भी सहमत हुआ है। इसके अलावा चीन, भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के बीच ट्रेड कॉरिडोर बनाने की बात भी की गई। चीन के साथ नागरिक इस्तेमाल की खातिर परमाणु समझौते की कोशिश भी होगी।
हालांकि, भारत चीन के बीच कई मुद्दों पर पहले भी सार्थक बातचीत होती रही है। सो देखना ये होगा कि इस बार सरहद विवाद को सुलझाने के लिए भारत का दबाव किस हद तक रंग लाता है, सिर्फ बातों और इऱादों से आगे बढ़कर क्या वाकई LAC को खींचा जा सकेगा?

नाव पलट जाने से एक बच्चे की मौत हो गयी और दो लापता

मीनापुर। कौशलेंद्र झा
मीनापुर। सिबाईपट्टी थाना के कोदरिया घाट पर बूढ़ी गंडक नदी में नाव पलट जाने से एक बच्चे की मौत हो गयी और दो लापता बताए जा रहें हैं। लापता होने वालों में एक महिला भी है। कोदरिया से मोरसंडी जा रही इस नाव पर करीब ढाई दर्जन लोग सवार थे। सूचना मिलतें ही स्थानीय प्रशासन के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर के डीएम, एसएसपी व एनडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंच कर बच्चे के शव को पानी से निकाला। लापता लोगो की तलाश अभी जारी है।

सर ! बड़ा हादसा हो गया है

मीनापुर। कौशलेंद्र झा

सर, कोदरिया घाट पर बूढ़ी गंडक नदी में एक नाव डूब गई है। उस पर बहुत लोग सवार थे। बड़ा हादसा हो गया। घटना के प्रत्यक्षदर्शी कोदरिया के विजय कुमार यादव ने कोदरिया घाट से दूरभाष पर सबसे पहले हिन्दुस्तान संवाददाता को यह सूचना दी। दरअसल विजय भी उसी नाव से नदी पार करने आया था, लेकिन बिलम्ब होने के कारण उसके चढ़ने से पहले ही नाव खुल गई।
नाव डूबने की खबर से घाट के दोनों किनारों पर कोहराम मच गया। देखते ही देखते हजारो की संख्या में लोग किनारे पर जमा होने लगे। आधा घंटे के भीतर प्रशासन के स्थानीय अधिकारी पहुंच गए। बाद में जिला प्रशासन के अधिकारी, मीनापुर के विधायक दिनेश प्रसाद व बरुराज के विधायक बृज किशोर सिंह भी पहुंचे।

यात्रियों व डूबने वालों की संख्या को लेकर लगती रही अटकलें

नाव पर कुल कितने लोग सवार थे, इसकी संख्या को लेकर लोग अटकलें लगाते रहे। मीनापुर थानाध्यक्ष मदन कुमार सिंह ने बताया कि करीब 20 से 25 लोग नाव पर सवार रहे होंगे। वही बनघारा के केदार सहनी ने बताया कि नाव पर एक बाइक सहित करीब 40 लोग सवार थे। राजद नेता मुन्ना यादव ने सात जबकि स्थानीय अन्य लोगों का कहना है कि डूबने वालों की संख्या एक दर्जन से अधिक हो सकती है।

Monday, September 15, 2014

सिवाईपट्टी थाने में विस्फोट से एएसआई जख्मी

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
सुबह लगभग 11 बजे थाने के ऊपर बरामदे की सफाई करते समय चौकी के नीचे हुआ विस्फोट
जख्मी एएसआई को एसकेएमसीएच में प्राथमिक उपचार के बाद पीएमसीएच किया गया रेफर

सिवाईपट्टी थाने में सोमवार को हुए विस्फोट में एएसआई अवधेश कुमार सिंह बुरी तरह से जख्मी हो गए। घायल अवस्था में उन्हें एसकेएमसीएच में भर्ती कराया गया जहां प्राथमिक इलाज के बाद उन्हें पीएमसीएच पटना रेफर कर दिया गया है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार श्री सिंह की स्थिति खतरे से बाहर बताई जा रही है।
इस संबंध में थाना अध्यक्ष अरुणंजय कुमार ने बताया कि श्री सिंह थाने के ऊपर बरामदे में चौकी लगाकर सोते हैं, वे अपने बरामदे की सफाई कर रहे थे उसी समय दिन के लगभग 11बजे चौकी के नीचे भयंकर विस्फोट हुआ जिसमे उनका चेहरा बुरी तरह झुलस गया और उनकी आंखों में भी गहरा जख्म हो गया। बम विस्फोट की आवाज सुनकर थाने में मौजूद पुलिस कर्मी भागते हुए ऊपर पहंुचे, पहले उन्हें लगा कि शायद सिलेंडर में विस्फोट हुआ है, लेकिन जब सभी ऊपर पहुंचे तो देखा कि चारो तरफ धुंआ फैला हुआ है और श्री सिंह कराह रहे हैं। इस विस्फोट में वहां पर रखे अन्य सामान भी जल गए। थाने में हुए बम विस्फोट से वहां पर अफरातफरी मच गई।
कहां से आया बम :
इसी वर्ष 2 मई को जगन्नाथ पकड़ी गांव के राजेश कुमार के घर में डाका पड़ा था। अगले दिन घटनास्थल से सटे चौड़ से लावारिस अवस्था में पुलिस ने चार जिंदा बम, सूतरी व एक मोबाईल बरामद किया गया था। यह वही बम था। पुलिस अधिकारी की मानें तो चार महीने पहले बरामद इस बम को निष्क्रिय करने के बाद उसको एक पोलीथिन में रखा गया था। किंतु, निष्क्रिय होने के बाद भी यह बम कैसे फटा? सवाल ये भी है कि मालखाना का बम चौकी के नीचे क्यों रखा गया था? फिलहाल इस सवाल का जवाब यहां किसी के पास नहीं है।

डॉक्‍टरों के लिए पहेली, हर 20 दिन में महिला के शरीर से निकलती है सूई

मीनापुर कौशलेन्द्र झा

बिहार: इंसानों के शरीर से ट्यूमर निकलने की घटनाएं आम है, लेकिन पटना जिले के मोकामा कस्‍बा में एक महिला के शरीर से हर 15-20 दिनों में एक सूई निकलती है।शरीर से निकल रही सूइयों की लंबाई चार से आठ सेंटीमीटर है। लड़की के शरीर से मार्च 2011 में पहली सूई निकली थी और तब से यह सिलसिला जारी है। अब तक 20 सूइयां निकल चुकी हैं। घटना शिवनार गांव की है और लड़की का ज्योति है और उसकी उम्र 18 साल है।
परिजनों ने बताया कि अब तक 20 सूइयां निकल चुकी हैं। तीन अब भी अंदर हैं। परिजनों ने कहा कि पंद्रह से बीस दिनों में एक सूई शरीर से बाहर आती है। इस दौरान उसे असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ती है। इनमें से एक सूई गले में है।
दर्द के कारण लड़की का खाना-पीना भी छूट गया है। साल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ज्योति को खुद जनता दरबार से पीएमसीएच भिजवाया था। इलाज भी चला, लेकिन परेशानी दूर नहीं हुई। सूई निकलने से पहले तेज जलन होती है। फिर दर्द शुरू होता है। स्किन पर काला धब्बा हो जाता है। 5 दिनों में सूई नजर आने लगती है। 10-15 दिनों में बाहर आ जाती है। ये अमूमन मोटे कपड़ों की सिलाई में काम आने वाली हैं।
ज्योति की रहस्यमय बीमारी से उसका परिवार परेशान है। पिता अशोक रविदास मजदूरी करते हैं। पैसे की तंगी से इलाज नहीं हो पा रहा है। मां उमा देवी ने कहा कि कोई उपाय नजर नहीं आता। इलाज के लिए उसे फिर पीएमसीएच रेफर किया गया है। चार बहनों और एक भाई में ज्योति दूसरे नंबर पर है। किसी प्रकार की मदद नहीं मिली तो परिजनों ने दोबारा जनता दरबार में जाना चाहा लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने अंदर नहीं जाने दिया।
पीएमसीएच में एनीस्थीसिया विभाग के डॉक्टर अशोक कुमार ने कहा कि शरीर में सूई बनना संभव नहीं है। लगता है कि लड़की ने खुद कभी इन सूइयों को निगल ली हो या किसी तरह से ये सूइयां उसके शरीर में डाली गई हों।

शिक्षक नियोजन में फर्जीवाड़े की जांच का आदेश

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
शिक्षक नियोजन के दौरान हुए फर्जीवाड़े को शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव ने गंभीरता से लिया है। फर्जीवाड़े को लेकर अखबार में छप रही खबरों का हवाला देते हुए उन्होंने मुजफ्फरपुर के जिला शिक्षा अधिकारी को जांच का निर्देश दिया है। वर्ष 2006, वर्ष 2008 से 2010 व वर्ष 2012 के अतिरिक्त 34540 कोटि में नियुक्त हुए शिक्षकों के शैक्षणिक व प्रशैक्षिण प्रमाण पत्रों की जांच रिपोर्ट उन्होंने तीन महीने के भीतर तलब किया है। गड़बड़ी मिलने पर कानूनी कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया है। गुरुवार को प्रधान सचिव के निर्देश की चिट्टी मीनापुर पहुंचते ही फर्जीवाड़ा करने वाले रैकेट में हड़कंप मच गया। प्रखंड में फर्जी प्रमाण पत्र पर शारीरिक शिक्षकों के नियोजन का भंडाफोड़ हो चुका है। कई अभ्यर्थियों के टीईटी का प्रमाण पत्र भी आशंकाओं के घेरे में है। अब जांच शुरू होने से कई शिक्षकों के साथ-साथ अधिकारियों की भी गर्दन फंसेंगी।

फर्जी हैं प्रमाण पत्र, बोर्ड ने भी लगायी मुहर

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
शिक्षक बहाली में फर्जीवाड़ा :
शारीरिक प्रशिक्षण महाविद्यालय में परीक्षा हुई नहीं, अभ्यर्थी ले आये प्रमाण पत्र
बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने भी प्रमाण पत्रों के फर्जी होने की कर दी पुष्टि
मीनापुर में 36 की बहाली जांच के घेरे में, बोचहां, औराई, गायघाट में भी फांसे गये हैं बेरोजगार

जिस सत्र में काॠलेज में परीक्षा तक नहीं हुई उस सत्र का सर्टिफिकेट लाकर दर्जनों बेरोजगार शिक्षक बन गये हैं। फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे मीनापुर में शिक्षकों की हुई फर्जी बहाली की पोल परत दर परत खुल रही है। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के पत्र से शारीरिक शिक्षकों के प्रमाण पत्र में फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई है।
दाउत छपरा के अरविंद कुमार की ओर से आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना के आलोक में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना के लोक सूचना अधिकारी ने अपने पत्रांक 4196 में स्पष्ट किया है कि कटिहार के वीर कुंवर सिंह शारीरिक प्रशिक्षण महाविद्यालय में वर्ष 1994 में शारीरिक शिक्षकों की कोई परीक्षा आयोजित नहीं हुई है। उन्होंने अपने एक अन्य पत्र (पत्र संख्या 4146) में बताया है कि केदार पांडेय शारीरिक एवं स्वास्थ्य प्रशिक्षण महाविद्यालय साधनापुरी, पटना में भी वर्ष 1994 में परीक्षा का आयोजन नहीं हुआ।
बावजूद इसके उक्त दोनों काॠलेजों के वर्ष 1994 का प्रमाण पत्र दिखाकर अकेले मीनापुर में 36 अभ्यार्थियों ने अपना नियोजन कराया है। अब ये शिक्षक जांच के घेरे में आ गये हैं। बोचहां, गायघाट, औराई समेत जिले के कई अन्य प्रखंडों में भी रैकेट से जुड़े जालसाजों ने फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी दिलाने के लिए बेरोजगारों को अपने जाल में फांसा है।

क्या है मामला :

वर्ष 2014 में मीनापुर में लगभग 200 शिक्षकों का नियोजन हुआ है। आरटीआई से मांगी गई सूचना के आधार पर नियोजन में हुई गड़बड़ी की कलई एक-एक कर खुल रही है। प्रखंड व पंचायत नियोजन इकाईयों में सर्वाधिक फर्जीवाड़ा हुआ है। टीईटी के फर्जी प्रमाण पत्रों के इस्तेमाल की भी चर्चा है। एक बेरोजगार के नियोजन पर तीन-तीन लाख रुपये तक की अवैध वसूली हुई है। इस कांड को लेकर खुद क्षेत्र के विधायक दिनेश प्रसाद ने 13 सितम्बर को शिक्षा सचिव से मिलने का समय मांगा है।

आरटीआई कार्यकर्ता को मिली धमकी :
फर्जीवाड़ा उजागर करने में सक्रिय रहे आरटीआई कार्यकर्ता दाउत छपरा के अरविंद कुमार को अज्ञात मोबाइल नम्बर से जान मारने की धमकी मिली है। काॠल करने वालों ने झूठे मुकदमे में भी फंसाने की धमकी दी है। अरविंद ने पुलिस महानिरीक्षक को ज्ञापन देकर मामले की शिकायत की है और सुरक्षा की गुहार लगाई है। अरविंद ने आरटीआई के तहत इस वर्ष जुलाई में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से शिक्षक नियोजन से संबंधित प्रमाण पत्रों की सत्यता के बाबत जानकारी मांगी थी।

टीईटी फर्जीवाड़े की जांच को बनेगी राज्यस्तरीय कमेटी

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
शिकायतों पर बिहार विद्यालय परीक्षा समिति अध्यक्ष गंभीर
वर्ष 2008 से नियोजित सभी शिक्षकों की होगी जांच
समिति के अध्यक्ष से मिला मीनापुर का प्रतिनिधिमंडल

मीनापुर में टीईटी उत्तीर्णता का फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर बड़े पैमाने पर शिक्षकों का नियोजन करने की शिकायतों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद सिंह ने गंभीरता से लिया है। शनिवार को मिलने गए मीनापुर के एक प्रतिनिधिमंडल को अध्यक्ष ने जांंच का भरोसा दिया है। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे जिला जदयू किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष मनोज कुमार ने बताया कि अध्यक्ष ने एक सप्ताह के भीतर राज्यस्तरीय जांच टीम गठित करने का भरोसा दिया है। यह टीम वर्ष 2008 से नियोजित सभी शिक्षको के प्रमाण पत्रो की विस्तार से जांच करेगी।
स्मरण रहे कि शिक्षक नियोजन में फर्जीवाड़ा को हिन्दुस्तान ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। इससे पहले मनोज ने परीक्षा समिति के अध्यक्ष को मीनापुर में चल रही फर्जीवाड़ा के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। बाद में मनोज ने हिन्दुस्तान को पटना से दूरभाष पर बताया कि मेधा सूची में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ हुई है। श्री कुमार ने साक्ष्य के रूप में सूचना के अधिकार से प्राप्त सभी दस्तावेजो को अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। इन दस्तावेजो क आधार पर मनोज ने बताया कि शिक्षक नियोजन में बड़े पैमाने पर शारीरिक शिक्षक के नाम पर फर्जी प्रमाण पत्र को अधार बनाया गया है। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार से ज्ञात हुआ कि सुन्दर सिंह काॠलेज, मेहोश, मुंगेर के द्वारा वर्ष 1992 में व वीर कुंवर सिंह शारीरिक प्रशिक्षण महाविद्याल, कटिहार के द्वारा वर्ष 1994 बैच के नाम से फर्जी प्रमाण पत्र बना कर बड़े पैमाने पर शिक्षक नियोजन का खेल खेला जा रहा है। इस कार्य में शिक्षा विभाग के कई अधिकारी की भूमिका संदेह के घेरे में है।

टीईटी फर्जीवाड़ा की लीपापोती में सफेदपोशों ने झोंकी ताकत

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
क्षेत्र में जोर पकड़ी फर्जीवाड़े की उच्चस्तरीय जांच की मांग
शिकायत पर डीडीसी को जांच का आदेश दे चुके हैं डीएम
13 को शिक्षा सचिव से मिलने का विधायक ने मांगा समय

टीईटी का फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर उसके सहारे शिक्षक नियोजन कराने वाले रैकेट का भांडा फूटने के बाद से मीनापुर में हड़कंप मचा हुआ है। एक तरफ इस फर्जीवाड़े की उच्चस्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है तो दूसरी तरफ रैकेट से जुड़े सफेदपोश मामले की लीपापोती में अपनी ताकत लगाने लगे हैं।
जदयू किसान प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष मनोज कुमार ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के सचिव को पत्र लिखकर टीईटी के प्रमाण पत्रों पर नियोजित शिक्षकों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। इससे पहले मनोज आयुक्त के जनता दरबार में भी इस मुद्दे को उठा चुके है। इस बीच नेउरा के अरविन्द कुमार की शिकायत पर डीएम डीडीसी को जांच का आदेश दे चुके हैं। वहीं विधायक दिनेश प्रसाद ने मामले में बातचीत के लिए शिक्षा सचिव से 13 सितम्बर का समय मांगा है। हालांकि चर्चा यह भी है कि ऐसा न करने के लिए उन पर रैकेट से जुड़े कुछ लोग लगातार दबाव बनाये हुए हैं।

आवेदन वापस लेने का दबाव :

सूचना के अधिकार के तहत टीईटी से संबंधित जानकारी मांगने वाले अब रैकेट के निशाने पर हैं। पुरैनिया के कृष्णमाधव सिंह ने बताया कि उन्हें इस मामले से पीछे हटने को कहा जा रहा है। शुक्रवार को मीनापुर के कई सफेदपोश उनके दरवाजे पर पहुंचे और आवेदन वापस लेने को बोले।

ऐसे कराते थे बहाली :

जानकार बताते हैं कि इस गोरखधंधा से जुड़े लोग तीन लाख तक लेकर टीईटी का फर्जी प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। इसके बाद शारीरिक प्रशिक्षण का जाली प्रमाण पत्र व जाली ज्वाइनिंग लेटर बनाकर धड़ल्ले से शिक्षकों का नियोजन कराते हैं। अब तक करीब पांच दर्जन से अधिक लोग इस गोरखधंधे का शिकार बन चुके हैं। इसमें शिक्षा विभाग के कुछेक अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में हैं। रैकेट चलाने वाले मीनापुर के अलावा बोचहां, मुशहरी, कुढ़नी व गायघाट प्रखंड के भी बेरोजगारों को फांस चुके हैं।

शिक्षक नियोजन में फर्जीवाड़े का मामला गरमाया

मीनापुर कौशलेन्द्र झा
प्रखंड में शिक्षक नियोजन में फर्जीवाड़ा का मामला तूल पकड़ने लगा है। बुधवार को विधायक दिनेश प्रसाद ने बताया कि वे 13 सितम्बर को शिक्षा विभाग के सचिव से शिकायत करेंगे। वहीं पुरैनिया के कृष्णमाधव सिंह ने आरटीआई के हवाले से नियोजित शिक्षको की सूची बीडीओ से मांगी है।
श्री सिंह ने दावा किया कि शारीरिक प्रशिक्षण के फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर अकेले मीनापुर में करीब पांच दर्जन शिक्षको की बहाली की गयी है। जानकार बतातें हैं कि वर्ष 1994 के जिस प्रमाण पत्र को बहाली का आधार बनाया जा रहा है, हकीकत में उक्त महाविद्यालय ने वर्ष 1994 में परीक्षा ली ही नहीं। वहीं पटना के जिस महाविद्यालय से उतीर्णता का प्रमाण पत्र दिखाया जा रहा है वहां कथित उतीर्ण अभ्यर्थी का नामांकन भी नहीं है। विधायक दिनेश प्रसाद की मानें तो मामले का उच्चस्तरीय जांच से टीईटी फर्जीवाड़ा के एक बड़े रेकैट का खुलासा हो सकता है। बताते चलें कि मीनापुर में इन दिनो बड़े पैमाने पर टीईटी फेल अभ्यर्थी के ज्वाईन करने की चर्चा है।

Tuesday, August 26, 2014

हम कहां और चीन कहां !

कौशलेन्द्र झा 

हमने 1947 में आजादी पायी थी, जबकि आधुनिक चीन की नींव 1949 में रखी। हमसे दो साल बाद अस्तित्व में आया आधुनिक चीन आज हमसे कई दशक आगे का सफर तय कर चुका है। यकीन नहीं होता तो इन तथ्यों पर गंभीरता से गौर फरमाइये :-
चीन ने भारत की मौजूदा 2 ट्रिलियन डॉलर की हैसियत 11 साल पहले ही हासिल कर ली थी। यानी अर्थव्यवस्था के मामले में भारत चीन से 11 साल पीछे है।
पिछले साल भारत का प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 3,851 डॉलर था, जबिक चीन का 9,146 डॉलर।
2012 में भारत का जीडीपी ग्रोथ रेट 5.3 था, जबकि चीन का 7.7।
वित्त वर्ष 2013-14 में भी चीन की अर्थव्यवस्था अनुमानत: लगभग 8 फीसदी के हिसाब से बढ़ रही है, जबकि हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर का अनुमान 5 फीसदी लगाया जा रहा है।
साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में बेरोजगारी दर 9.8 फीसदी थी, जबकि चीन में 4.1 फीसदी।
इसी साल भारत का बजट घाटा कुल जीडीपी का 7.2 फीसदी था, जबकि चीन का 1.1 फीसदी।
हम अपनी जीडीपी का महज 36 फीसदी निवेश करते हैं, जबकि चीन अपनी जीडीपी का 48 फीसदी निवेश में लगाता है।
भारत की आबादी के लगभग 32.7 फीसदी लोग अभी गरीब हैं, जबकि चीन में यह स्थिति साल 2002 में ही थी। वहां अब गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले यानी रोज सवा डॉलर से कम खर्च करनेवालों का प्रतिशत घट गया है।
करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2012 के मुताबिक दुनिया के भ्रष्टतम देशों में भारत का स्थान 94वां था, जबकि चीन का 80वां।
33 प्रतिशत भारतीयों को बिजली उपलब्ध नहीं है, जबकि चीन की आबादी के महज एक फीसदी लोगों तक ही बिजली की पहुंच नहीं है।
विश्व व्यापार में भारत की भागीदारी महज 0.6 फीसदी है, जबकि चीन और हांगकांग मिलकर 6 फीसदी भागीदारी रखते हैं।
इसी तरह वैश्विक क्रय शक्ति में भारतीयों का प्रतिशत 1.3 है, जबकि चीन का 3.2, वहीं भारत में दुनिया भर के 0.38 फीसदी पयर्टक आते हैं, जबकि चीन में 11.5 फीसदी। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी भारत में दुनिया का 0.25 जबकि चीन में 10.25 होता है।
इस साल के पहले 6 महीनों में 3 लाख 44 हजार 700 भारतीयों ने चीन की यात्रा की, जो पिछले साल की समान अवधि से 14.26 फीसदी अधिक है। जबकि, साल 2012 में कुल एक लाख से अधिक चीनी पर्यटक भारत आये थे।
साल 2011 में 31 फीसदी भारतीय शहरों में रहते थे, लेकिन चीन की इतनी ही प्रतिशत आबादी 1980 के दशक से पहले ही शहरों में रह रही थी।
साल 2000 से चीन में 12 फीसदी वेतन वृद्धि हुयी है, जबकि भारत में महज 2.5 फीसदी। 90 फीसदी भारतीय अब भी अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करते हैं।
काम के उत्पादन की कीमत लगायी जाय तो औसतन एक भारतीय कामगार सालाना 8,401 डॉलर उत्पादित करता है, चीन ने इस आंकड़े को सात साल पहले 2006 में छू लिया था।
भारत में धान की प्रति हेक्टेयर पैदावार चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया की तुलना में करीब आधी है। अगर भारत की पैदावार बढ़ाकर चीन के बराबर कर ली जाए तो खाद्यान्न के लिए जल और भूमि की व्यवस्था आसानी से हो जाएगी।
मानव संसाधन

चीन मानक भारत

1, 344,130,000 कुल आबादी 1,241,491,960

749,610,775 उपलब्ध मानव संसाधन 615,201,057

618,588,627 सैन्य सेवा के लायक मानव संसाधन 489,571,520

19,538,534 हर साल सैन्य सेवा में जाने लायक 22,896,956

तैयार हो रही आबादी

चीन मानक भारत

2,285,000 कार्यरत सैनिक 1,325,000

800,000 कार्यरत सैन्य रिजर्व 1,747,000

795,500,000 श्रम शक्ति 487,600,000

-0.33 फीसदी नेट पलायन दर 0.05 फीसदी

6.5 फीसदी बेरोजगारी दर 9.8 फीसदी

2,494 सूचीबद्ध घरेलू कम्पनियां 5,191

आधारभूत ढांचा

चीन मानक भारत

3,860,800 कि.मी. सड़क मार्ग 3,320,40 कि.मी.

86,000 कि.मी. रेल मार्ग 63,947 कि.मी.

110,000 कि.मी. जल मार्ग 14,500 कि.मी.

14,500 कि.मी. समुद्रतटीय मार्ग 7,000 कि.मी.

22, 117 कि.मी. दूसरे देशों से लगी सीमाएं 14, 103 कि.मी.

9,596,961 कि.मी. वर्गीय भूमि क्षेत्र 3,287,263 कि.मी.

सामरिक क्षमता

चीन ने हाल ही में देश में ही तैयार किया गया पांचवी पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान दुनिया के सामने लाकर अपनी हवाई ताकत दिखायी। जबकि भारत के पास इस श्रेणी का विमान 2022 से पहले नहीं आ पाएगा। ग्लोबल फायर पावर (जीएफपी) ने दुनिया के महत्वपूर्ण 68 देशों की सामरिक क्षमता का आकलन किया है। संस्था ने इन देशों की सामरिक क्षमता के आधार पर इनकी रैंकिंग भी की है। इस सूचि में चीन तीसरे और भारत चौथे स्थान पर है। संस्था की वेबसाइट पर दिये आंकड़ों के आधार पर सामरिक नजरिए से चीन और भारत के बीच निम्नांकित परिदृश्य उभरते हैं:-

थल सेना

चीन मानक भारत

7,950 कुल टैंक क्षमता 3,555

18,700 साजो-सामान से लैस युद्धक वाहन 2,293

2,500 कुल एसपीजी क्षमता 330

25,000 टाउड आर्टिलरी 6,585

2,600 मल्टिपल रॉकेट लॉंच सिस्टम 292

10,500 कुल मोर्टार 5,000

31,250 एंटी टैंक विपनरी 51,800

75,850 ढुलाई वाहन 70,000

वायु सेना

चीन मानक भारत

5,048 कुल लड़ाकू विमान 1, 962

901 कुल सैन्य हेलीकॉप्टर 620

497 सेवा योग्य हवाई अड्डे 352

नौ सेना

चीन मानक भारत

2,032 व्यापारिक जहाज 340

8 बड़े बंदरगाह और टर्मिनल 7

972 नौसैनिक जहाज 170

1 विमान वाहक 1

63 पनडुब्बी बेड़ा 15

47 पोतों की संख्या 14

25 विनाशक पोत 8

0 लड़ाकू जलपोत 24

52 इन वारफेयर क्राफ्ट 8

322 समुद्र तटीय पेट्रोलिंग वाहन 31

228 एम्फीबियस असॉल्ट क्राफ्ट 16

Monday, August 18, 2014

क्या राधा भगवान कृष्ण की प्रेमिका थीं?

कौशलेन्द्र झा
क्या राधा भगवान कृष्ण की प्रेमिका थीं? यदि थीं तो फिर कृष्ण ने उनसे विवाह क्यों नहीं किया? कृष्ण ने अपने जीवनकाल में 8 स्त्रियों से विवाह किया, तो क्या उन्हें राधा से विवाह करने में कोई दिक्कत थी? कृष्ण की 8 पत्नियों के नाम- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।
कहते हैं कि राधा और कृष्ण के प्रेम की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। कृष्ण नंदगांव में रहते थे और राधा बरसाने में। नंदगांव और बरसाने से मथुरा लगभग 42-45 किलोमीटर दूर है। अब सवाल यह उठता है कि जब 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा चले गए थे, तो इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रेम या रास की कल्पना कैसे की जा सकती है? मथुरा में उन्होंने कंस से लोहा लिया और कंस का अंत करने के बाद वे हस्तिनापुर की राजनीति में इन्वॉल्व हो गए।
उल्लेखनीय है कि महाभारत या भागवत पुराण में 'राधा' के नाम का जरा भी उल्लेख नहीं मिलता है। फिर यह राधा नाम की महिला भगवान कृष्ण के जीवन में कैसे आ गई या कहीं यह मध्यकाल के कवियों की कल्पना तो नहीं?
यह सच है कि कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में राधा का नाम नहीं है। सुखदेवजी ने भी भागवत में राधा का नाम नहीं लिया। यदि भगवान कृष्ण के जीवन में राधा का जरा भी महत्व था, तो क्यों नहीं राधा का नाम कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में मिलता है?
मध्यकाल या भक्तिकाल में राधा और कृष्ण की प्रेमकथा को विस्तार मिला। अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया और कृष्ण के योद्धा चरित्र का नाश कर दिया गया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। निम्बार्क, चैतन्य, बल्लभ, राधावल्लभ, स्वामी हरिदास का सखी- ये संप्रदाय राधा-कृष्ण भक्ति के 5 स्तंभ बनकर खड़े हैं। निम्बार्क का जन्म 1250 ईस्वी में हुआ। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी?

Saturday, August 16, 2014

... और अंग्रेज थानेदार को जिंदा जला दिया


मीनापुर थाने से यूनियन जैक उतारकर आजादी के दीवानों ने लहराया था तिरंगा

मीनापुर कांड से हिल गई अंग्रेजी हुकूमत की चूल, कई ने दी थी कुर्बानी


मीनापुर कौशलेन्द्र झा
बात 72 साल पुरानी है। 16 अगस्त 1942 को पं. सहदेव झा के नेतृत्व में स्वतंत्रता सैनानियों ने न सिर्फ बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत मीनापुर थाने से यूनियन जैक उतारकर तिरंग लहराया, बल्कि तात्कालीन थानेदार लुइस वालर को थाना परिसर में ही जिंदा जला दिया। घटना से ब्रिटिश हुकूमत की चूल हिल गई। हालांकि, इस संघर्ष में नौ लोग शहीद हो गए और कई दर्जन लोग जख्मी हुए।

8 अगस्त 1942 को राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी। इसी आलोक में 11 अगस्त को हरका के पं. सहदेव झा के दरवाजे पर देशभक्तों ने गुप्त बैठक की। मीनापुर फतह की योजना बनी। इसकी भनक अंग्रेजों को लग गयी। ब्रिटिश हुकूमत ने आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए नेपाल की सीमा पर स्थित अपनी फौज की एक टुकड़ी को मीनापुर रवाना कर दिया।

अंग्रेजी फौज पर टूट पर आजादी के दीवाने:

15 अगस्त 1942 को ब्रिटिश फौज के रामपुरहरि पहुंचते ही आजादी के दीवानों ने फौज पर हमला बोल दिया। इस संघर्ष में विसनदेव पटवा, चतर्भुज मिश्र, रमण राय, केशव शाही और बिन्देश्वर पाठक मौके पर ही शहीद हो गए और दो दर्जन से अधिक लोग जख्मी हुए। इस घटना से लोगों में आक्रोश और भड़क गया । आगे की रणनीति के लिए हरका में एक और गुप्त बैठक हुई।

मीनापुर थाने पर हमला :

योजना के मुताबिक 16 अगस्त 1942 की तपती दुपहरिया में स्वतंत्रता सैनानियों ने मीनापुर थाना पर धावा बोल दिया। थानेदार लुइस वालर को थाने पर जिंदा जलाने के बाद लोगो ने यूनियन जैक उतारकर थाना पर तिरंगा फहरा दिया। इस दौरान अंग्रेजों की गोली से चैनपुर के बांगूर सहनी शहीद हो गए। इसके अतिरिक्त झिटकहियां के जगन्नाथ सिंह, भिखारी सिंह, रीझन सिंह, पुरैनिया के राजदेव सिंह, रामदहाउर सिंह, चैनपुर के बिगन सहनी, हसनपुर के दुलार सिंह व चाकोछपरा के रौशन साह को गोली लगी थी। कई लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे।

पुलिस प्रताड़ना से दो की मौत :

पुलिस ने मीनापुर थाना कांड संख्या यूएस 396/42 में वालर की हत्या के आरोप में 14 व थाना में तोड़फोड़ करने के आरोप में 27 लोगों पर एफआईआर दर्ज किया। बाद में आरोपितों की संख्या बढ़ाकर 87 कर दी गई। अंग्रेजी हुकूमत ने छापामरी के नाम पर दर्जनों गांव में कहर बरपाया। महदेईया को आग के हवाले कर दिया गया। लोग अंग्रेजों के भय से घर छोड़कर भागने लगे। इसी बीच नेपाल के जलेसर जेल में पुलिस की प्रताड़ना से मुस्तफागंज के बिहारी ठाकुर व हरका के सुवंश झा की मौत हो गयी।

वालर को मैने मारा

वालर हत्याकांड की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। चैनपुर के जुब्बा सहनी ने जूरी की मंशा को पहले ही भांप लिया। फैसला आने से पहले ही भरी अदालत में जुब्बा सहनी ने स्वीकार कर लिया कि वालर को मैंने मारा। अंग्रेजी हुकूमत ने 11 मार्च 1944 को भागलपुर सेंट्रल जेल में जुब्बा सहनी को फांसी दे दी और पुरैनिया के राजदेव सिंह, रामधारी सिंह, मुस्तफागंज के बिहारी साह हरका के सुवंश झा व मुसलमानीचक के रुपन भगत को आजीवन कारावास की सजा दी गयी। वही हत्या आरोपित अन्य 8 लोगों को रिहा कर दिया गया। रिहा होने वालों में रौशन साह, लक्ष्मी सिंह, जनक भगत, पलट भगत, नारायण महतो, संतलाल महतो, अकलू बैठा व गोबिंद महतो का नाम शामिल है।

झोपरपट्टियों से आज भी नही निकल पाए शहीद के गांव चैनपुर के लोग

;महान शहीद के पैतृक गांव की दुर्दशा


मीनापुर कौशलेन्द्र झा

अंग्रेज थानेदार लुईस वालर को मीनापुर थाना में चिता सजा कर देश की खातिर फांसी को आलिंगन करने वाले अमर शहीद जुब्बा सहनी का पैतृक गांव चैनपुर। आजदी के 68 साल बाद भी अपनी बदहाली पर आठ आठ आंसू बहाने को अभिशप्त है। झोपड़पट्टियों से अटा पड़ा इस गांव में इक्का दुक्का ही पक्का मकान देखने को मिला। कहतें हैं कि चुनाव का मौसम आते ही चैनपुर नेताओं का तीर्थस्थल बन जता है। सभी यहां की मिट्टी को नमन करने आतें हैं। बावजूद इसके आज तक चैनपुर को राजश्व गांव का दर्जा नही मिलना। अब यहा के लोगो को चुभने लगा है।

गांव में प्रवेश करतें ही कमर में मैला कुचला एक धोती लपटे हुए वयोबृद्ध चन्देश्वर सहनी से मुलाकात हो गयी। बदलाव की बाबत सवाल पूछते ही श्री सहनी भड़क जातें हैं। कहने लगे कि गांव में 90 प्रतिशत लोग निरक्षर है। कारण ये कि आजादी के बाद गांव में एक मात्र विद्यालय खुला, वह भी उर्दू। हिन्दी के छात्रों को दो किलो मिटर दूर धारपुर जाना परता है।

गावं में आगे बढ़ते ही सोमारी देवी पर नजर पड़ी। उसके गोद में करीब एक साल का बच्चा है, बच्चा क ा आंख भीतर तक धसा है और कलेजा व बांह का हड्डी दिखता है। जबकि, पेट फुला हुआ है। ऐसे और भी दर्जनो बच्चे दिखे, जो जबरदस्त कुपोषण के शिकार हैं। समीप में ही अर्द्धनग्न हालत में बैठे राजेन्द्र सहनी कहने लगे गांव में सरकारी डाॠक्टर कभी आया ही नही। यदा कदा एएनएम आती है। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर चैनपुर से करीब तीन किलोमिटर दूर गोरीगामा में स्वास्थ्य उपकेन्द्र है। किंतु, वहा गांव वालों को देखने के लिए न डाॠक्टर है और नाही दवा। जगन्नाथ सहनी कहतें हैं कि गावं के लोग दो पाईप वाले यानी 40 फीट गहरा चापाकल का पानी पीतें हैं। जबकि, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग इस पानी को पीने के लायक नही मानता है। दुसरी ओर तीन सरकारी चापाकल भी है, जो खराब पड़ा है।

कहने के लिए इस गांव का विद्युत्तिकरण हो चुका है। गांव में चारो ओर झुका हुआ पोल और खतरनाक हालात में लटका हुआ तार देखने को भी मिला। कई जगह बांस के पोल के सहारे भी लटका हुआ तार दीखा। लोगो के घर में मीटर भी लगा है। पर, वह चलता नही है। मामुली तुफान भी आ जाये तो सप्ताहों बिजली नही आती है। गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए प्रधान मंत्री सड़क है। किंतु, दो साल में ही इस सड़क का पींच उखड़ने लगा है। अजय सहनी ने जिलाधिकारी से इसकी शिकायत की तो ठेककेदार ने उन पर रंगदारी मांगने का आरोप लगा दिया। पर, किसी ने इसकी जांच करना जरुरी नही समझा।

शहीद की पतोहू पेट की खातिर मजदूरी करने को है विवश :

गावं के बीच में सरकारी मकान में रह रही 80 वर्षिया अनाथ मुनिया देवी। जीने के लिए हर पल जद्दो जेहाद करती हुयी मिली। यह वही मुनिया है, जिसके चचेरा ससुर जुब्बा सहनी को अंग्रेजो ने 11 मार्च 1944 को भागलपुर सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ा दिया था। जुब्बा सहनी की यह इकलौती जीवित बची परिजन, उम्र की इस आखरी पराव में पेट की खातिर मजदूरी करती है। गरीबी व फटेहाली में जीवन वसर करने वाली मुनिया का दुर्भाग्य एक साल पहले ही शुरू हो गया। बूढ़ापे का सहारा मुनिया का एकलौता बेटा रुपलाल सहनी उर्फ बिकाउ सहनी गत वर्ष फांसी लगा कर आत्महत्या कर लिया और पतोहू अपने तीन लड़की व एक लड़का को लेकर मैके चली गयी। मुनिया कहती है कि कभी कभार पतोहू आती है। नजीता मुनिया को अपने गुजारा के लिए इस उम्र में मजदूरी करना पड़ रहा है। 

Thursday, August 14, 2014

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ भारत के बिहार प्रदेश की ओर से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ भारत के बिहार प्रदेश की ओर से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Sunday, May 18, 2014

बिहार : इस्तीफा से उभरे राजनीतिक परिदृश्य

कौशलेन्द्र झा 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफा से उभरे राजनीतिक परिदृश्य को लेकर हमारा बिहार एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। मुख्यमंत्री इस्तीफा वापिस लेंगे या नही? संशय अभी भी बरकरार है। शरदजी की बतों से तो लगता है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन होके रहेगा। पर, विधायक दल के हठ के सामने हो सकता है कि नीतीशजी को झुकना पड़े। सवाल उठता है कि क्या यह जरुरी था? रविवार को पुरा दिन बिहार में राजद व जदयू के नए समीकरण की बात होती रही। हालांकि, स्वयं लालूजी इनकार करते रहे। किंतु, जदयू के राष्ट्रीय नेता केसी त्यागी ने राजद से हाथ मिलाने का जो संकेत दिया। क्या उसका दूरगामी असर नही परेगा? राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते मैं दावे से कह सकता हूं कि लोकसभा चुनाव परिणाम अपने जगह पर सत्य है। पर, यह भी उतना ही सत्य है कि बिहार आज भी नीतीश और लालू के ध्रूवीकरण से उबर नही पाया है। रविवार की घटनाक्रम ने नीतीश समर्थको को सोचने पर विवश कर दिया है। यदि, आज नीतीशजी अपना इस्तीफा वपिस लेतें हैं तो सम्भव है कि बिहार की राजनीति में ध्रूवीकरण बरकरार रह जाये। किंतु, यदि नेतृत्व परिर्वतन हुआ तो बिहार की राजनीति में भाजपा की धमक को रोकना और भी मुश्किल हो जायेगा। सबसे अहम बात तो ये है कि यदि इस उठा पटक के बीच बिहार में किसी की सरकार नही बनी तो राष्ट्रपति शासन अवश्यसंभावी है। यानी केन्द्र की सत्ता सम्भालने के साथ ही मोदीजी को बिहार का बागडोर थाली में परोस कर देने की तैयारी हो रही है। ताज्जुब की बात है कि बिहारी की थाली को मोदीजी के लिए सजाने वाले वे लोग हैं, जो खुद को मोदी बिरोधी होने का दंभ भरतें हैं। बहुत हो गया, रुठने और मनाने का दौड़। कुर्सी सम्भालिए, काम करिये और मुल्यांकन मतदाताओं को करने दीजिए।

बिहार की राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ पर

कौशलेन्द्र झा 

बिहार की राजनीति एक बार फिर से दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ पर है। मुख्यमंत्री के इस्तीफा को हल्के में नही लेना चाहिए। वल्की, इसके और भी कई संकेत हो सकतें हैं। दरअसल मंत्रीपरिषद की खींचतान व विस्तार का दबाव नीतीश कुमार पहले से झेल रहे थे। ऐसे में लोकसभा चुनाव परिणाम ने उनको अंदर तक हिला दिया है। आंख मिलाने में हिचकने वाले मंत्री भी अब मंत्रीपरिषद की बैठक में सरेआम भिड़ने लगे हैं। मुख्यमंत्री का इकवाल खतरे में पड़ गया है। इन परिस्थितियों से उबरने में मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देकर ब्रम्हास्त्र तो चलाया किंतु, अब यही गेम नीतीश कुमार के लिए उल्टा परने लगा है। मुझे कई विधायको ने बताया कि आज शाम विधायकदल की बैठक में एक बार फिर से नीतीश कुमार को ही नेता चुन लिया जायेगा। हालांकि, यह बात दीगर है कि नीतीश दुबारा मुख्यमंत्री बनेंगे या नही? जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नेतृत्व में बदलाव के पक्षधर हो गयें है। तेजी से बदल रहे समीकरण में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद से बात करना चौकाता है। सवाल यही खत्म नही होता। वल्की, लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जदयू का राष्ट्रीय नेतृत्व बिहार में नए समीकरण तलाश रहा हैं। सोशल इंजीनियरिंग में माहिर नीतीश कुमार का जिद, बिहार में भाजपा के लिए जमीन तैयार करने में कारगार साबित हो चुका है। बहरहाल, नीतीश कुमार का यह मास्टर स्टाक नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य तय करने वाला है। मेरे समझ से राजनीति में जिद व द्वेश के लिए कोई स्थान नही होना चाहिए। अंत में मैं सिर्फ इतना ही कहंूगा कि जो हो रहा है, वह बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

Vaishali

कौशलेन्द्र झा 
Party CANDIDATE NO. OF VOTES % OF VOTES
LJP Rama Kishor Singh 305450 - 32%
RJD Raghuvansh Prasad Singh 206183 - 22%
JD(U) Vijay Kumar Sahni 145182 - 15%
IND Annu Shukla 104229 - 11%
BSP Shankar Mehto 23677 - 2%
IND Dr. Md. Nabi Hasan 22455 - 2%
IND Balender Singh 15178 - 1%
IND Jitender Prasad 12369 1%
IND Ranjit Kumar Jha 11540 -1%
RHSD Md. Hasiv 11075 -1%
IND Md. Umar Ansari 8254 -0%
AAP Raj Mangal Prasad 7768 - 0%
IND Ram Pukar Rai 7182 - 0%
LPSP Vinod Pandit 6430 - 0%
NOTA NOTA 6060 -0%
RHKSP Mukesh Ram 5497 - 0%
IND Rameshwar Shah 5483 - 0%
SUCI(C) Indradev Rao 5218 - 0%
BMP Parmeshvar Ram 4000 - 0%
VSIP Md. Naushad 3866 - 0%
BJVP Jaynarayan Shah 3191 - 0%
IND Sandhya Devi 2983 - 0%
IND Lalji Kumar Rakesh 2667 - 0%

Wednesday, May 7, 2014

राजनीति में महिलाएं

 कौशलेन्द्र झा
राजनीति में महिलाओं पर होने वाली हिंसा को लेकर संयुक्त राष्ट्र और सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की रिपोर्ट चौंकाने वाली है, खासकर भारत को लेकर। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 45 फीसदी महिला प्रत्याशियों को हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जिस देश में लगभग आधी मतदाता महिलाएं हों, उस देश में आजादी के 67 साल बाद भी राजनीति में आने वाली महिलाओं पर हिंसा हमारे लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगाती है।
महिलाओं के अनुपात में उन्हें राजनीति में प्रतिनिधित्व मिलना तो दूर हिंसा के डर से उन्हें राजनीति में आने से रोकने की कोशिश खतरनाक संकेत है। आजादी के बाद से देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जोर-शोर से अभियान चलाए गए। सरकारों से लेकर राजनीतिक दलों और स्वयं सेवी संगठनों ने महिलाओं को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए माहौल बनाने के हर संभव प्रयास किए। लेकिन धरातल पर जो स्थिति है वह रिपोर्ट में सामने आई है। महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर देने की बातें तो सभी दल करते हैं लेकिन व्यवहार में इसके उलट देखने को मिलता है।
संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण देने का मामला सालों से लंबित पड़ा है। कारण साफ है कि कोई भी दल सच्चे मन से शायद यह नहीं चाहता कि राजनीति में महिलाओं को आरक्षण मिले। 49 फीसदी महिलाओं की संख्या के मुकाबले 15वीं लोकसभा में कुल 58 महिलाएं चुनकर आई थीं, जो सदन की संख्या का 11 फीसदी भी नहीं हैं। संसद में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिल जाए तो लोकसभा में 180 महिलाएं चुनकर आ सकती हैं। जिस दिन ऎसा हो पाएगा, तभी राजनीति में महिलाएं सुरक्षित हो पाएंगी।
महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में चुनकर आने का फायदा राजनीति के शुद्धिकरण के रूप में भी मिल सकता है। महिला प्रत्याशियों के चुनावी मैदान में उतरने से राजनीति में होने वाली हिंसा पर तो लगाम लगेगी ही, आरोप-प्रत्यारोप से गंदी हो रही राजनीति पर भी विराम लगेगा। दुनिया के दूसरे देशों में भी महिलाएं राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यूरोप और अमरीका में दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के मुकाबले राजनीति में रहने वाली महिलाओं को हिंसा का सामना नहीं करना पड़ता है। केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ सभी राजनीतिक दल समाज में व्याप्त इस बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने की ठान लें तो कोई कारण नहीं कि भारत की महिलाओं को भी राजनीतिक मैदान में हिंसा से छुटकारा नहीं मिल सके।

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Friday, May 2, 2014

भैयेजी जीतने की अग्रिम बधाई

कौशलेन्द्र झा
बात चली है चुनावी गर्मी की तो, बैठे बिठाए निठल्ले ठंडे-ठाये लोगों में पोलेटिक्स का करंट दौडऩे लगा है। जिसको देखो वो चुनाव में खड़ा होने की सोच रहा है, कुछ सोच ही रहे हैं, तो कुछ खड़े भी हो रहे हैं। ऐसे ही चुनाव में खड़े होने की तमन्ना वाले एक नेताजी से हमने पूछ लिया- भैयेजी, आप खड़े हो रहे हैं। वे बोले-जी हां, जी हां। हमने कहा-भैये जीतने की अग्रिम बधाई, तो वे बोले बधाई-वधाई तो ठीक है, पर एक बात बताएं हम कोई जीतने के लिए थोड़े ही इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं? हमारी मोटी बुद्घि में बात घुसी नहीं। हमने तपाक से पूछ लिया-अमां, जीतने के लिए नहीं खड़े हो रहे हैं, तो फिर किसलिए...?
हमारी बात को सुनकर पहले तो छुटभैये नेताजी को हमारी बुद्घि पर तरस आया, फिर अपने ज्ञान का पिटारा खोला और हमारे कंधे पर हाथ रखते हुए अपने मुख से ज्ञान उढ़ेलने लगे व बोले-हम- हम जीतने के लिए थोड़े ही खड़े हो रहे हैं, अरे कलमकार हम तो नाम के लिए खड़े हो रहे हैं, नाम के लिए। जीते या हारे जाए भाड़ में। इसी बहाने नाम हो जाएगा, कि हम इलेक्शन में खड़े हुए थे। आगे नेताजी समझाते हुए हमसे बोले- ...और खुदा न खास्ता मजाक मजाक में जीत गए तो भैये मजा ही मजा है। मैंने कहा- अच्छा तो ये बात है। अब हमें समझ में आया कि जगह-जगह इलेक्शन में केंडिडेटों की धड़ाधड़ भीड़ क्यों बढ़ रही है। हम तो समझे थे कि इत्ते सारे लोगों में अपने कस्बे, नगर, गांव के प्रति प्रेम उफान मार रहा है, तो कुछ काम करने के लिए लोग इलेक्शन में खड़े हो रहे हैं, पर अब सबको समझ जाना चाहिए कि यहां काम की नहीं, नाम की मारामारी है।
भैये, ये जनता समझती नहीं, हर चुनाव में नेताओं पर भनभनाती है, कि काम क्या किया, काम क्या किया.... हमरे एक फ्रेन्ड बोलते हैं, काम बोलना चाहिए काम। वही बात इस मुई जनता के दिमाग में घुसी हुई है, काम बोलना चाहिए काम।
पर इस मुई जनता को क्या मालूम कि अपने नेताजी को काम धाम से कोई मतलब नहीं, नाम में इंन्ट्रेस्ट है। जो लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? वो जरा हमरे नेताजी से जाकर पुछिए, कि नाम में क्या रखा है? नाम की महिमा क्या है? अपने नेताजी का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, कस्बे का नाम होगा, तो देश का नाम होगा।
पर, क्या करें नेताजी, ये जनता नाम की महिमा समझती ही नहीं, सब आप जैसे समझदार थोड़े ही हैं। पर नेताजी, आप समझना, आप तो समझदार है। भैये जी, आप जैसे सबको नाम का चस्का नहीं लगा है और जिस दिन आपकी कृपा से जनता को नाम का चस्का लग जाएगा, उस दिन सब काम धाम बंद। नाम चमकाने का काम शुरू। सुनकर के नेताजी बोले- वो सब तो खैर ठीक है। हम हमारा नाम और चमकाना चाहते हैं, इसलिए हमरे ऊपर वाले लीडर का मना रहे हैं। जरूर आईए।
तो भैया जी नेताजी ने हमें इन्वीटेशन दे दिया है। हम बड़े नेताजी का मनाकर आते हैं, तब तक आप नेता-नाम की महिमा समझिए और ज्यादा समझ में आ जाए, तो हमें भी समझाईए...। ठीक है ना...

खुली आंखों से सपना देखा।

कौशलेन्द्र झा
एक फ़िल्म आई थी परदेस.......... जी .. जी.. जी.. बिल्कुल वही शाह रुख खान वाली ..... उसमे एक लड़की थी रितु चोधरी जी हां वही जिसे सब महिमा चोधरी के नाम से जानते है याद है न परदेस की वो भोली भली सी लड़की .....जी तो अब इस तस्वीर को देखिये और बताइए क्या ये वही है ? आपको यकीं हो या न हो लेकिन बिल्कुल वही महिमा है ये वो भोली भली सी लड़की अब एक खतरनाक कातिल हसीना बन गई है हमारी कही बात पे यकीन नही होता ? तो अपनी आँखों पर यकीन कीजिये । वही महिमा आज मीनापुर आई थी। एक चुनावी जनसभा में। देवीजी क ा दर्शन हुआ। समझ में नही आता कि थैक्स किसे बोलूं? सीने अदाकारा महिमा को या उस नेताजी को, जिनके दिवा स्वप्न की वजह से मैंने अपनी खुली आंखों से सपना देखा।

Wednesday, April 30, 2014

चूहा-बिल्ली के खेल में उलझे राजनीतिक बयानवीर

कौशलेन्द्र झा 

नेताओं के बारे में हमेशा कहा जाता है कि वे जमीन से जुड़े होते हैं। हर नेता स्वयं भी यही साबित करने की कोशिश करता है कि वही सबसे ज्यादा जमीन से जुड़ा नेता है। हम सभी आम जन यह मानते आए हैं कि जमीन से जुड़े होने का मतलब नेताओं का आमजन और उनकी समस्याओं, हित अहित से जुड़ाव से होता है। लेकिन चुनावों के दौरान हमें हकीकत पता चलती है कि इसका मतलब तो यही होता है कि अपने कार्यकाल में किसी नेता ने जमीन से अपने स्वार्थ के लिए कितना कमाया।
अब देखिए न नेताओं के बीच आजकल जिस तरह चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है, उसकी जड़ें जमीन में ही हैं। खेल की शुरुआत गुजरात में मोदी सरकार द्वारा अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपतियों को नगण्य दामों पर जमीन देने के कांग्रेस के आरोपों से हुई, जिसके जवाब में भाजपा को एक अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जनरल ने एक बड़ा मुद्दा याद दिला दिया।
अखबार के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा जमीन का लेनदेन करते हुए कुछ ही वर्षों में एक ही वर्ष में एक लाख से तीन सौ करोड़ रुपए से ज्यादा के मालिक बन गए। अखबार में यह छपने के बाद से भाजपा हाथ धोकर सोनिया गांधी परिवार के पीछे पड़ गई। यहां तक कि दामादश्री के नाम से एक छोटी फिल्म ही बना डाली। साथ ही वाड्रा के कारनामों पर एक बुकलेट भी जारी कर दी।
भाजपा के इन हमलों का जवाब सोनिया गांधी और राहुल ने तो नहीं दिया लेकिन पति पर हमलों के जवाब में प्रियंका गांधी मैदान में उतरी और यहां तक कह बैठीं कि चुनाव में तिलमिलाए भाजपा नेता चूहों की तरह बिल से बाहर निकल आए हैं और हमारे परिवार पर निजी हमले करने लगे हैं। प्रियंका के बयान पर भाजपा नेताओं ने भी पलटवार किए और निजी हमलों के बयानों का नया दौर प्रारंभ हो गया। व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप किस हद तक लगेंगे यह नेता शायद स्वयं भी नहीं जानते। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन द्वारा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को कसाई कहना तो यही साबित करता है। हालांकि बाद में देश के ऊलजलूल बयानबीर लालू यादव ने भी ब्रायन के समान मोदी को कसाई कहते हुए ट्वीट किया। इसके पूर्व जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक बयान देते हुए कहा कि मोदी को वोट देने वालों को समुद्र में डूब मरना चाहिए। वे भाजपा नेता गिरिराज सिंह के बयान का जवाब दे रहे थे, जिसमें कहा गया था कि मोदी के खिलाफ वोट करने वालों को पाकिस्तान भेज देंगे। गिरिराज के इस बयान पर पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई और गिरफ्तारी की नौबत तक आई।
देखा जाए तो चुनाव ही वो काल है जब हमें नेताओं की असली औकात सामने दिखाई देती है। इस अवसर पर नेता इतने घटिया स्तर पर उतर आते हैं जिसकी कल्पना भी नहीं ‍की जा सकती। आम जनता लाचारी के साथ इन बयानवीरों को देखती रहती है। वह करे भी तो क्या। उस पर ये नेता (आडवाणी गुजरात में) कहते हैं कि वोट डालना अनिवार्य किया जाना चाहिए। ईवीएम में नोटा के विकल्प को भी हल नहीं माना जा सकता। हल तो सिर्फ यही है कि नेता अपना आचरण सुधारें और भारतीय संस्कृति के अनुसार देश को पुराना सम्मान और गौरव लौटाने के प्रयास करें।

.सिर्फ रस्म बनकर रह गया है मजदूर दिवस

कौशलेन्द्र झा 

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जिसको मई दिवस के नाम से जाना जाता है, इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय शुरू हुई थी, जब मजदूर मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया और बाद में पुलिस फायरिंग में कुछ मजदूरों की मौत हो गई, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। इसके बाद 1889 में पेरिस में अंतरराष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में जब फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसको अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, उसी वक्त से दुनिया के 80 देशों में मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा। भारत में 1923 से इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में समाजवाद की आवाज कम ही सुनाई देती है। ऐसे हालात में मई दिवस की हालत क्या होगी, यह सवाल प्रासंगिक हो गया है। हम ऐतिहासिक दृष्टि से 'दुनिया के मजदूरों एक हो' के नारे को देखें तो उस वक्त भी दुनिया के लोग दो खेमों में बंटे हुए थे। अमीर और गरीब देशों के बीच फर्क था। सारे देशों में कुशल और अकुशल श्रमिक एक साथ ट्रेड यूनियन में भागीदार नहीं थे।

Friday, April 25, 2014

कही ये आपको उल्लू तो नही बना रहें हैं..........

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
बात दिसम्बर 2011 की है। मैं मीडिया रत्न अबार्ड लेने देहरादून गया था। दिन भर चली अलंकरण समारोह के बाद शाम को लौट कर होटल आया। इसी होटल की गैलरी में राष्ट्रीय पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता से मिलने का मौका मिला। वे पंजाबी थी और अपने एक समर्थक को कह रहे थे कि आप जैसे चलाक इंसान को उसने टोपी कैसे पहना दिया? उस वक्त मैं इसका अर्थ समझ नही पाया। बाद में पता चला कि टोपी पहनाने को पंजाबी लोग उल्लू बनाना कहतें हैं।
तीन साल बाद आज वही टोपी याद आ गया है। हमारे लोकतंत्र के महापर्व में टोपी पहना देना आम बात हो गया है। आम आदम ने टोपी को चुनाव का बढि़या मुद्दा बना दिया है। आम आदमी तो लोगो को टोपी पहना ही रहा है। सच तो ये है कि कोई भी इस पुनीत कार्य में पीछे नही है। कांगे्रस गांधी टोपी और भाजपा की भगवा टोपी तक तो बात समझ में आती हैं। यहां तो समाजवादी भी टोपी पहनाने लगें हैं। भाई मेरे, कही ये टोपी पहना कर आपको उल्लू तो नही बना रहें हैं? सोच लीजिए। सोचने में जाता ही क्या है?

नेता और जनता का ‘रोमांस’

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा 
जब नेता और जनता के बीच मोहब्बत के चर्चे हों तो समझो चुनाव करीब आ गए हैं. नारों लगाती भीड़ के हाथों में पत्थर और डंडें हो तो समझो चुनाव आ गए हैं. पति एक पार्टी में और पत्नी दूसरी पार्टी में चले जाएं तो समझों चुनाव आ गए हैं. वोट और नोट के संबंधों पर विचार-विमर्श होने लगें तो समझो लोकतंत्र का त्योहार करीब आ गया है. यह बात दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के बारे में सच जान पड़ती है.
16वें लोकसभा चुनावों की तैयारियों का असर बढ़ती नक्सली गतिविधियों, धमाके में उड़ते स्कूलों, रैलियों में जुटती भीड़, पार्टी बदलते नेता, अभिनेता से नेता बनते फ़िल्मी दुनिया के नायक और खलनायक. संप्रदाय, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, शिक्षा, जागरूकता के आधार पर इतना साफ़ विभाजन पाँच सालों के अंतराल पर या बीच-बीच में होने वाले अलग-अलग चुनावों के दौरान ही नज़र आता है. चुनावों के दौर की ईमानदारी काबिल-ए-ग़ौर होती है. जनता और नेता अपनी पहचान जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, विचारधारा, पार्टी, मौकापरस्ती, व्यावहारिकता को गले लगाते प्रतीत होते हैं. नेताओं की सत्ता चरित्र सामने आता है.
विचारधारा का खूंटा तोड़कर भागते नेता बताते हैं कि यह धारा जब व्यक्तिगत तरक्की की राह में रोड़ बन जाय तो इससे उबर जाना बेहतर होता है. एक नाव डूबने लगे तो दूसरे पर सवार हो लेना अच्छा रहता है. लेकिन एक ही सीख हर किसी के लिए लागू नहीं होती. जो जनता के बीच मजबूत है. वह हमेसा राजनीति के इम्तिहान में अव्वल आता है. इतने सारे लोकसभा क्षेत्र हैं. अकेले भारत के सबसे बड़े आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं. इसका लाभ यहां के कद्दावर नेताओं को मिलता है.
कुछ नेताओं का तो सत्ता का फार्मूला काफ़ी सीधा है. पाँच साल के बाद पार्टी बदल लो, लोकसभा विधानसभा क्षेत्र बदलो, पैसा फूंको, जनता का वोट बटोरो और सत्ता का सुख भोगो. कुछ नेताओं ने इस फ़ार्मूले को बड़े अच्छे से साधा है. लेकिन हर किसी के लिए दौड़भाग वाली प्रतियोगिता का हिस्सा बनना आसान नहीं होता. लेकिन भारती. राजनीति के प्रोफ़ेशन के बारे में भी एक बात कभी-कभार सच लगती है कि तरक्की के लिए पार्टी बदलना और मंत्रालय तक पहुंचने के लिए मौका देखकर गुट बदलना कितना जरूरी होता है?
अभी भागते राजनेताओं की भगदड़ देखने लायक है. कौन किधर चला जाएगा, कुछ कहना मुश्किल है…ऐसा लगता है सारे नेताओं को भागने की बीमारी लग गई है…..कोई टिकट के लिए भाग रहा है, कोई वोट के लिए भाग रहा है, कोई चुनावी ख़र्चों वाले नोट के लिए भाग रहा है, कोई अपनी पार्टी छोड़कर…नई पार्टी की तरफ़ भाग रहा है,,,तो कोई विचारधारा का खूंटा तोड़कर भाग रहा है….इतनी भागमभाग का कोई लाभ नहीं…खरगोश वाली कहानी की तरह तेज़ भागदौड़ के खर्राटे वाली नींद का नज़ार भी देखने को मिलेगा.
अंत में सवाल रचनात्मक क्षेत्र के लोगों के राजनीति में पदार्पण का कि आख़िर देश की राजनीति में कलाकारों का क्या उपयोग हो सकता है?
अभिनेताः लोगों के बीच प्रचार के लिए विकास का अभिनय करेंगे.
गायकः विकास के ऐसे अनोखे गीत लिखेंगे कि सुनने वाले चौंक जाएं.
विदूषकः जनता को मुफ़्त में भद्दा मनोरंजन उपलब्ध करवाएंगे.
 

मीडिया की काँव-काँव …

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
सुबह-सुबह मीडिया की काँव-काँव की शुरुआत टेलीविजन से साथ हो जाती है. एक ही बात बार-बार दोहराई जाती है. जोर-जोर से चिल्लाई जाता है. लोगों के कान में कर्कश आवाज़ घुसाई जाती है. मुद्दों का अभाव और दूर जाने की इच्छा का अभाव और संसाधनों की सीमितता गिनी-चुनी ख़बरों तक, गिने-चुने राज्यों तक, समिट जाती है. सुबह-सुबह कौवे का काँव-काँव के अलावा कोई विकल्प नहीं है. भले हैं वो ग़रीब लोग जिनके घर में टेलीविजन नहीं है,. अच्छे हैं वो लोग जिनके घर में लोगों की मौत, दहशत और ख़ौफ़ के साथ सपनों की अन्जानी सी दुनिया लेकर आने वाला अख़बार नहीं आता. ख़ुश हैं वो लोग जो अपने काम में व्यस्त हैं. जिनके पास किसी की चुगली करने. किसी की पीठ पीछे बुराई करने की फुरसत नहीं है. जिनके काम से लोगों को लोगों की ज़िंदगी में थोड़ा सा बगदलाव आता है. थोड़ा सकारात्मक असर पड़ता है.
विरोध-समर्थन-तरफ़दारी-पक्षपात वाली राजनीति के प्रपंच से दूर रहने वाले वाकई ख़ुश हैं. क्योंकि उनती ज़िंदगी तमाशे को देखते हुए, तमाशा नहीं बनती. बदलाव के नारों के साथ तेज़ी-तेज़ी गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलती. वो जीवन और प्रकृति के गतिमान रंगों के साथ मन में होने वाले बदलाओं को महसूस करते हैं. प्रकृति को जीवन में घुसने देते हैं और ख़ुद भी प्रकृति के बदलाव में शरीक होते हैं. शामिल होते हैं. काँव-काँव में गहराई का अभाव है. तथ्यों की हैराफेरी है.
इस हेराफरी और तरफ़ादारी के खेल को समझने के लिए बड़ी वस्तुनिष्ठता की जरूरत है. जिसका निर्माण तमाम खूंटे से बँधे होने की बाध्यताओं से रस्सा तुड़ाने और स्वतंत्र तरीके से जीना ही हो सकता है. इसका कोई भी विकल्प जो हमारे लिए बेहतर हो हमें ख़ुद ही चुनना पड़ता है. तमाम व्यस्तताओं के बीच सुकून के लम्हे खोजना. तमाम आग्रहों और पूर्वाग्रहों की पिटारी को किनारे पटककर सुकून से बैठने का लम्हा भी यादगार होता है.
आद एक ही नाम, सत्ता, दल और विचार के समर्थन और विरोध की काँव-काँव सुनाई दे रही है. इस काँव-काँव से किसी की नींद ख़राब करने की बात हो रही है तो किसी का सुकून छीनने की कोशिश की जा रही है. आख़िर में महोदय ने निंदारस का पान करते हुए कहा कि हम निंदा करते हैं. लेकिन लोगों का दिन खराबह करनमे और लोगों को परेशान करने के लिए माफ़ी माँग लेने का हुनर भी काबिल-ए-तारीफ़ है. काँव-काँव से दो लम्हे छीन लेने वाले जज्बे को सलाम है. ऐसा जज्बा बना और बचा रहे, इस शुभकामना के साथ विदा.


हक़ मिला, हक़ीक़त बदली क्या?

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ‘वेंटिलेटर’ पर हैं……..कुछ लोगों का कहना है कि चुनाव हैं. इसलिए रुपए की क़ीमतों में गिरावट का खेल, खेला जा रहा है….ताकि विदेशों में जमा ‘काले धन’ का थोड़े हिस्से से ‘चुनावी जंग’ जीती जा सके. ऐसा लगता है मानो मोहब्बत, जंग और चुनाव में सब जायज है. बहुत सारी चीज़े रणनीति बनाकर तय की जाती हैं और उसका दोष आंतरिक और वाह्य कारणों पर मढ़कर खुद को निर्दोष बताया जाता है.
किसानी की ‘सार्वजनिक उपेक्षा’ का सरकारी एजेंडा किसी से छुपा नहीं है. ऊपर से प्रधानमंत्री का बयान कि कृषि क्षेत्र से काफी उम्मीदे हैं. पहली पंचवर्षीय योजना के बाद से कृषि को हासिए पर ढकेलने के नीति आज भी जारी है. अब तो पीछे मुड़कर देखने का कोई सवाल ही नहीं है. भारतीय कृषि को मॉनसून का जुआ कहा जाता है. सरकार भी जुआ खेल रही है.
सरकार को पता है कि औघोगिक क्षेत्र की कोई लॉबी किसानों के लिए उनके ऊपर दबाव बनाने से रही. सबसे कमज़ोर स्थिति वाले लोगों को ही राजनीति में मोहरा बनाया जाता है. इसीलिए सारे मनमाने फैसले लिए जाते हैं. फसल का मूल्य निर्धारण हो, बढ़ती क़ीमतों पर लगाम लगाने के लिए विदेशों से आयात हो, ‘खाद्य सुरक्षा’ के नाम पर ‘खेती की उपेक्षा’ और बर्बादी का लोकलुभावन फैसला जो विकास के खेल में ‘आत्मघाती गोल’ साबित हो सकता है.
जब देश में अनाज नहीं होगा तो विदेशों से आयात क लोगों को इसकी पूर्ति करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. सारी फायदा विदेशी एजेंसियों को मिलेगा. क्या उस समय चालू खाते का तथाकथित घाटा, विपरीत भुगतान संतुलन नहीं बढ़ेगा? आर्थिक विकास के तमाम शब्दकोषों की आड़ में सरकार तमाम खेल, खेल रही है और परिणामों का तमाशा देख रही है.
गाँव में एक कहावत कही जाती है कि किसान तो ‘हरी दूब’ हैं. इनको चाहे जितना काटो फिर से पनप आते हैं. यह मुहावरा संभवतः कृषि क्षेत्र पर टिके उद्योगों जैसे चीन मिलों के कोर ग्रुप से बाहर निकला है, गन्ने की कम क़ीमतें देना. घटतौली करना और आसपास की जमीनों को औने-पौने दामों पर दबाव बनाकर खरीदने के किस्सों की भरमार है. उसी सोच की राह पर सरकारी नीतियों का निर्माण हो रहा है और लोगों को बताया जा रहा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक से किसानों का लाभ होगा. कितना लाभ हुआ है, अतीत इस बात का गवाह है, भविष्य भी देख लेते हैं.
इस बात के समर्थन में अर्थशास्त्रियों की एक लॉबी लंबे समय से काम कर रही है. 2008 में ऐसे ही एक अर्थशास्त्री को सुनने का मौका मिला. जिसमें उन्होंने कहा था कि किसानों को अपनी ज़मीन कंपनियों को बेचकर बच्चों को पढ़ाना चाहिए. लंबे समय तक लोगों का मानस रचने के काम के बाद सरकार विदेयक लेकर आ गयी है. पास भी हो गया है
दूसरी तरफ रिपोर्टें आ रही है कि गाँव में नौकरियों की कमी होगा. युवाओं को शहरों को ओर पलायन करना होगा. सरकार को गाँव के लोगों को गाँव में रोकने के लिए प्रयास करना चाहिए. इसके लिए कई सालों से ‘पूरा’ योजना के तहत शहरी सुविधाओं के झाँसे में गाँव के लोगों को फांसने का काम सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ कर रही है.


Tuesday, April 22, 2014

हम तो डूबेंगे ‘सनम’ तुमको भी ले डूबेंगे

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
‘हम तो डूबेंगे, औरों को भी डुबो देंगे.’ जी हां, बिहार के चुनावी महाभारत में कुछ इसी तर्ज पर कई उम्मीदवारों ने नाराज होकर चुनावी मैदान में खूंटे गाड़ दिए हैं. कुछ तो पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर मजबूरीवश अखाड़े में हैं तो कुछ अपनी उपस्थिति दर्ज कराके पार्टी के शीर्ष नेताओं को चुनौती दे रहे हैं. मकसद सिर्फ इतना कि हम तो डूबेंगे ही आपको भी डुबो देंगे. हालांकि जीत की हसरत सभी उम्मीदवारों की है और जब तक चुनाव परिणाम सामने नहीं आ जाता. किसी की दावेदारी कम नहीं आंकी जा सकती है. ऐतिहासिक भूमि वैशाली से चर्चा शुरू करें तो यहां जदयू के लिए पार्टी की बागी उम्मीदवार अनु शुक्ला परेशानी खड़ी कर रही हैं. सत्ताधारी जदयू ने यहां से विजय साहनी को उम्मीदवार बनाया है. स्थानीय विधायक अनु शुक्ला वैशाली से टिकट मांग रही थीं, किंतु टिकट नहीं मिला. अनु शुक्ला जदयू के ही दबंग पूर्व विधायक विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला की पत्नी हैं. अनु शुक्ला के बागी तेवर से जदयू को भूमिहारों का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. वैसे वैशाली संसदीय क्षेत्र से राजद के दिग्गज रघुवंश प्रसाद सिंह पिछले पांच लोकसभा चुनाव से विजय पताका लहराते आ रहे हैं. ऐसे में जदयू को युद्ध में भिड़ने के लिए नयी रणनीति पर विचार करना होगा. दूसरी तरफ भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन की तरफ से यह सीट लोजपा को मिली है. ज्ञात हो कि वैशाली जिले के अंतर्गत आने वाले हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान नए तेवर में मैदान में हैं

सवाल सबसे बड़े लोकतंत्र का.....

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  

कल रात एक चैनल पर समाचार वाचक अचानक गीत गाने लगा - उपर पान की दुकान की दुकान, नीचे भगवा की जुटान। हुआ यें कि हमारे केजरीवाल साहेब को बनारसी पान खाने की इच्छा हो गयी। तो बनारस के तंग गलियों की थकान मिटाने के लिए पहुंच गए बनारस के एक मसहूर पान के दुकान पर। वह दुकान उपरी मंजिल पर था और हमारे केजरीवाल साहेब अभी गिलोरी खाए भी नही कि कान में आवाज पड़ी, मोदी...मोदी....मोदी....। नीचे झांक कर देखा तो भगवा समर्थको की भीड़। हमारे केजरीवाल साहेब ने फ्लाइंग किस मारा और पिछले दरबाजे से खिसग गये।
पर ये भगवा वाले भी हद करतें हैं भाई। पहले से ही पिछले दरबाजे पर घात लगाए बैठे थे और निकलते ही अंडों की बौछार कर दी। एक खबर आई कि भाषण करने गए थे, भीड़ ने टमाटर दे मारा। वेचारे, समझ पाते उससे पहले ही पत्रकार जी पहुंच गए। भोंपू उनके मुंह से सटाया और सवाल...इस पर आपको क्या कहना है? जनाव, पहले टमाटर का दाग तो पोछ लेने देते। खैर...हमारे केजरीवाल साहेब भी मजे हुए खिलाड़ी हैं। कहने लगे कि ये बच्चें हैं। कल एक गांव में गया तो वहां भी मोदी मोदी हो रहा था। कागज का टुकड़ा पढ़ाया तो सभी केजरी केजरी करने लगे।
भाईयों, अब मेरे समझ में आया कि हमारा भारत महान कैसे है? कैसे हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है? दुसरे देश वाले चुनाव के दौरान अपनी राष्ट्रीय नीति, आर्थिक विकास और अपनी विदेश नीति को उछालतें हैं। हम चुनाव आतें ही उसकी पत्नी को ढ़ूढ़ निकालतें हैं। कौन किसका फोन टेप कर रहा है, निकाल लातें हैं। नेताजी के कितने बच्चें हैं? यदि नही है तो क्यों नही है? जीजाजी अमीर कैसे हो गए? नेताजी कुत्ता के पिल्ला हैं या कुत्ता का बड़ा भाई? राष्ट्रीय चैनल पर बैठ कर हमारे टीकाकार लगातार तीन रोज तक इसी विषय पर वहस करतें हैं। कौन जहर उगल रहा है और कौन जहर की खेती कर रहा है? इतना ही नही टाफी या गुब्बारा हाथ लग जाए तो एक सप्ताह तक उसको छोरते नही। दुनियां वालों अब समझ में आया कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र कैसे हैं?

ओपिनियन पोल

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
बिहार की सभी 40 सीटों पर मेरी पार्टी ही जितेगी। बिहार के सभी बड़े नेता इन दिनो ऐसा ही दावा करतें हुए अक्सर दीख जातें हैं। बिहार ही क्यू? यूपी, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भी इस तरह के दावेदारो की कमी नही है। राष्ट्रीय स्तर पर तो 300 सीट मिलने का दावा होने लगा। और यदि ओपिनियन पोल वाला सीट गिना दे तो यही नेता भड़क जातें हैं। कहने लगतें हैं कि बिका हुआ है। वोटर प्रभावित हो रहा है। आदि, आदि। भाई मेरे समझ में तो बिल्कुल नही आया कि ओपिनियन पोल से यदि वास्तव में वोटर प्रभावित होतें हैं, तो प्रभाव तो आपके दावों से भी पड़ता होगा। चलिए मान लेतें हैं कि ओपिनियन पोल वाले बिक चुकें हैं। पर, आपको किसने खरीदा? आप तो समझदार हैं। जानतें हैं कि इसका असर पड़ जाता है। फिर, संयम क्यों खो देतें हैं? क्या, प्रजातंत्र के इस महापर्व में पार्टी या नेता के संबंध में जानने का हक प्रजा को नही है? क्यों आप प्रजा को गुमराह करके सिर्फ अपनी बातों में उलझाए रखना चाहतें हैं। ये सच है कि कई बार ओपिनियन पोल गलत साबित हो चुका है। पर, यह भी तो सच हैं कि उसका एक आधार है। आपके दावों का आधार क्या हैं? मैं यह मानता हूं कि ओपिनियन पोल गुमराह कर सकता है। पर, यह भी सच हैं कि आप तो निश्चत रुप से गुमराह ही कर रहें हैं। आप बताइये कि प्रजातंत्र के इस महापर्व में प्रजा अपने नेताओं की औकाद का आकलन करे, तो कैसे करे? मैं जानता हूं कि आपके पास मेरे सवालो का कोई जवाब नही है। क्योंकि, सच तो यही है कि जनता का रहनुमा वास्तव में उसी जनता को गुमराह करके अपना उल्लू सिधा करना चाहता है और ओपिनियन से मतदाता की आंख कही खुल न जाये, इससे डरता है। लिहाजा, सभी नेता इसको बंद करने पर अमादा है। मेरी स्पष्ट राय हैं कि ओपिनियन पोल को बंद करने से बेहतर होगा कि उसको और अधिक वैज्ञानिक आधार देने पर विचार किया जाए। ताकि ओपिनियन पोल की विश्वसनियता बहाल हो सके और आवाम को समय रहतें सच्चाई का पता चल सके।

Friday, April 18, 2014

धर्मों में परिवर्तन के क्या कारण हैं


मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
क्या हिन्दू होना अपराध है। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि सभी धर्म के लोग भगवान् के ही बनाए हुए प्रक्रति का स्वरुप हैं। सबका मालिक एक है। लेकिन इनलोगों को हिन्दू धर्म से अन्य धर्मों में परिवर्तन होने के क्या कारण हैं इसपर बहस होनी चाहिए।
हम दुसरे धर्म का सम्मान करें लेकिन अपने धर्म को कैसे भूल जाए। लालच क्या नहीं करवा सकता।
कांग्रेस के 80% मंत्री धर्मपरिवर्तित ईसाई या मुसलमान है बस धोखे देने
को नाम ही हिन्दू की तरह है हिन्दू वोटरो को लुभाने के लिए….
• सबसे पहले सोनिया गांधी असली नाम एंटोनिया माइनो कट्टर कैथोलिक ईसाई
• राहुल गांधी असली नाम राउल विंची
• प्रियंका गांधी का पति राबर्ट वाड्रा कट्टर ईसाई
• प्रियंका के दो बच्चे रेहना और मिराया
• दिग्विजय सिंह ईसाई धर्म अपना चुका है
• छतीसगढ़ के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजित जोगी और उनका पूरा परिवार ईसाई धर्म
अपना चुका है
• कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदम्बरम ईसाई बन चुके है और उनकी पत्नी
नलिनी 167 ईसाई
मिशनरी एनजीओ की मालकिन है
• पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस
केजी बालाकृषडन भी ईसाई धर्म अपना चुके है
• 2जी घोटाले का आरोपी ए राजा ईसाई है
• द्रमुक प्रमुख एम के करुणानिधि व उनका पूराखानदान ईसाई बन चुका है
• वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी, सुबोध कान्त सहाय, कपिल सिब्बल,
सत्यव्रत चतुर्वेदी, अंबिका सोनी,पीवी थामस, ए के एन्टोनी, जनार्दन
दिवेदी, मनीष तिवारी ये सभी ईसाई
धर्म अपना चुके है
• धर्म को अफीम मनाने वाले कम्युनिस्ट सीताराम येचूरी, प्रकाश करात,
विनायक सेन ईसाई है
• अरुंधति राय, स्वामी अग्निवेस, सारे कांग्रेसी पत्रकार ईसाई हो चुके है
• आंध्र प्रदेश के 150 से ज्यादा मंत्री ईसाई बन चुके है इसलिए आंध्र
प्रदेश मे सारे मंदिरो को तोड़ा जा चुका है ,
• बाकी बचे नेता मुस्लिम है जैसे सलमान खुर्सीद, अहमद पटेल इत्यादि ।
• आंध्र प्रदेश के वाईएसआर रेड्डी ईसाई है और उसका बेटा अनिल जो की ईसाई
मिशनरी समाज का सबसे बड़ा माफिया है,इसी अनिल पर यह भी आरोप है की धर्म
परिवर्तन के लिए जो कमीशन बाहर से आता है उसके लेनदेन संबंधी बँटवारे को
लेकर अनिल ने वाईएसआर केआई हत्या का षड्यंत्र रचा था । इसी अनिल ने पूरे
भारत के जनमानस
को ईसाई बनाने का ठेका लिया है । इसके पास 21 निजी हेलीकाप्टर है व खरबो
रुपये की संपति है इसनेकेवल हैदराबाद मे ही 100 से ज्यादा conversion
workshops लगा रखी है धर्म परिवर्तन के लिए । इसका ढांचा किसी बहुत बड़ी
एमएनसी कंपनी द्वारा बनाया गय जिसमे सीईओ से लेकर मार्केटिंग
professionals तक भर्ती किए जाते है । प्रत्येक ईसाई मिशनरी को टार्गेट
दिया जाता है की प्रति सप्ताह 10 हिन्दुओ को ईसाई बनानेका और कमीशन
दिया जाता है । औसतन 200 हिन्दुओ को ईसाई धर्म परिवर्तन न करने के कारण
जला दिया जाता है । यह सरकारी आंकड़ा है असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती
है

Wednesday, April 16, 2014

वोट के लिए जियारत, टिकट देने में सियासत

मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
बिहार के 243 विधान सभा क्षेत्रों के 50 से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित हो सकता है। इन विधान सभा क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 18 से 74 प्रतिशत है। लगभग पचास से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में उनकी आबादी 10 से 17 प्रतिशत है। बिहार की कुल आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 16.5 है आबादी के लिहाज से देखें तो कम-से-कम बिहार विधान सभा में 38-40 मुसलमान प्रतिनिधियों को पहुंचना चाहिए, लेकिन पहुंचते हैं 24-25।
बिहार में मुसलमानों की सबसे अधिक आबादी 74 प्रतिशत नए विधान सभा क्षेत्र कोचाधमन और पुराने विधान सभा क्षेत्र अमौर में है। नए बने विधान सभा क्षेत्रों में बलरामपुर में लगभग 65 प्रतिशत और पुराने विधान सभा क्षेत्र जोकीहाट में मुसलमानों की आबादी 68 प्रतिशत है। बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, अररिया, कदवा, प्राणपुर, कोढ़ा और बरारी में तो मुस्लिम आबादी की तादाद अच्छी-खासी है। अजजा के लिए सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र मनिहारी में मुसलमानों की आबादी लगभग 41 प्रतिशत है।
पश्चिम चम्पारण के सिकटा और नरकटियागंज में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत और 29 प्रतिशत है। इसी तरह रामनगर (अजा), चनपटिया में 21 प्रतिशत और बेतिया में 27 प्रतिशत आबादी है। नौतन में 18 प्रतिशत तो बगहा में पंद्रह प्रतिशत है। पूर्वी चम्पारण के रक्सौल, नरकटिया और हरसिद्ध (अजा) और सुगौली में आबादी 24 प्रतिशत है। मधुबनी के राजनगर (अजा) में 14 प्रतिशत तो बिस्फी में 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसी तरह सीतामढ़ी के परिहार, सुरसंड, बाजपट्‌टी और सीतामढ़ी में आबादी 18 प्रतिशत से 32 प्रतिशत है। मनिहारी में 41 प्रतिशत तो बरारी में 31 और कोढ़ा में 33 प्रतिशत है। मुसलमानों की आबादी गौड़ाबौराम, दरभंगा ग्रामीण, अली नगर और बेनीपुर, जाले और केवटी में 22 से 32 प्रतिशत के बीच है।
गोपालगंज और बरौली में 23-24 प्रतिशत तो हथुआ विधान सभा क्षेत्र में मुसलमानों की 19 प्रतिशत आबादी बसती है। सीवान, रघुनाथपुर बड़हरिया में 21 प्रतिशत से 27 प्रतिशत आबादी बसती है। भागलपुर में 30 प्रतिशत, नाथनगर में 24 प्रतिशत, कहलगांव में 19 प्रतिशत, बांका के धेरैया में 18 प्रतिशत, बिहारशरीफ में लगभग 24 प्रतिशत और गया शहर में 25 प्रतिशत आबादी बसती है।
10 प्रतिशत से अधिक और 17 प्रतिशत से कम आबादी वाले क्षेत्र
बाल्मीकिनगर, बगहा, गोविंदगंज, केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मोतिहारी, चिरैया, रीगा, बथनाहा, रून्नी सैदपुर, हरलाखी, बेलसंड, खजौली, बाबूबरही, राजनगर (अजा), झंझारपुर, फुलपरास, लौकहा, निर्मली, पिपला, सुपौल, त्रिवेणीगंज, बनमनखी (अजा), रूपौली, आलमनगर, बिहारीगंज, सिहेंद्गवर, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषि, कुशेश्वर स्थान (अजा), बेनीपुर, हायाघाट, बहादुरपुर, गायघाट, औराई, मीनापुर, सकरा (अजा), बोचहा (अजा), कुढनी, बरूराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, कुचायकोट, भोरे, जीरादेई, दरौंदा, महाराजगंज, एकमा, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, अमनौर और परसा। वैशाली, महुआ, पातेपुर (अजा), कल्याणपुर (अजा), वारिशनगर समस्तीपुर, मोरवा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी (अजा), खगड़िया, परबत्ता, बिहपुर, पीरपैंती (अजा), सुलतानगंज, अमरपुर, बांका, कटोरिया (अजजा), मुंगेर, बांकीपुर, फुलवारी (अजा), आरा, तरारी, चैनपुर, सासाराम, डिहरी, अरवल, औरंगाबाद, इमामगंज (अजा), बाराचट्‌टी (अजा), बेलागंज,वजीरगंज, हिसुआ, नवादा, गोविन्दपुर, सिकन्दरा (अजा), जमुई, झाझा, चकाई।